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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में सुधार के लिए मंत्रियों का समूह करेगा समीक्षा

नेशनल थॉट्स डेस्क।  किसानों के बीच प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रति बढ़ते गुस्से से चिंतित केंद्र ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में मंत्रियों का एक सात सदस्यीय समूह बनाया है।  यह मंत्रियों का समूह इस योजना की समीक्षा करेगा और किसानों की जरूरत के हिसाब से इसे बेहतर बनाने के लिए सुझाव देगा।  कुछ राज्यों ने भी प्रधानमंत्री फसल बीमा से दूरी बनाई है।  इस समूह में गृह मंत्री अमित शाह और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और कृषि, वित्त, आदिवासी मामलों और पशुपालन राज्य मंत्री भी शामिल हैं. काफी समय से मांग उठती रही है कि किसानों के लिए यह फसल बीमा स्वैच्छिक हो। ज्यादा प्रीमियम वाली फसलों को इस योजना से बाहर किया जाये।  इसके अलावा हर राज्य को यह अधिकार हो कि वह अपने राज्य के किसानों की जरूरत के मुताबिक फसल बीमा उत्पादों को शामिल कर सकें।

कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “तीन राज्यों ने इस स्कीम से नाता तोड़ लिया है।  इसके अलावा चार बीमा कंपनियां भी इस योजना से बाहर निकल गई हैं। मौजूदा योजना में कुछ बदलाव लाने के लिए हमें कुछ राज्यों से फीडबैक मिला है।  इन राज्यों और किसान संगठनों ने योजना में कुछ बदलाव की मांग की है।  अब, मंत्रियों का समूह फसल बीमा के नए प्रारूप पर फैसला करेगा. बिहार, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की जगह अपनी राज्य में अलग से फसल बीमा योजना शुरू की है। बिहार सबसे पहला राज्य था जिसने इस योजना से दूरी बनाई थी।  2018 में बिहार ने इस स्कीम से नाता तोड़ लिया था।

दूसरी ओर, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड, टाटा एआईजी, चोलामंडलम एमएस और श्रीराम जनरल इंश्योरेंस ने फसल बीमा कारोबार में नुकसान का हवाला देते हुए इस योजना से खुद को अलग कर लिया है। कृषि मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, “पिछले साल 17 कंपनियां फसल बीमा कर रही थीं जबकि इस साल (खरीफ और रबी सीजन) के लिए केवल 13 कंपनियों ने ही फसल बीमा करने के लिए बोली गई है। हमें इस बात की चिंता है कि अगले सीजन के लिए और निजी बीमा कंपनियां इस योजना से बाहर निकल सकती हैं। इस योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को खरीफ फसलों के लिए दो फीसदी और रबी फसलों के लिए 1.5 फीसदी प्रीमियम चुकाना होता है।  बागवानी फसलों के लिए प्रीमियम कुछ ज्यादा है और इसके लिए किसानों को 5% राशि का भुगतान करना होता है।  बाकी प्रीमियम की रकम केंद्र और संबंधित राज्य सरकारें बराबर-बराबर भरती हैं।

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