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फांसी के फंदे में झूलने का नहीं बल्कि भारत के लिए कुछ नहीं कर पाने का है दुःख

जाऊँगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगाजाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा?

बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं फिर आऊँगा,फिर आऊँगा,फिर आकर के ऐ भारत माँ तुझको आज़ाद कराऊँगा”.

जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ

   हाँ खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगाऔर जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा.”           

अशफ़ाक़ उल्ला खाँ  

ये पंक्तियाँ अपने आप में देशभक्ति की उस भावना को बयां करती हैजिसे शब्दों में संजोना सब की बस की बात नहीं हैआज बेशक हिंदुस्तान के एक तबके को देशप्रेम सिद्ध करने के लिए “भारत माता की जय” कहकर अपनी देशभक्ति सिद्ध करनी पड़ती हो लेकिन क्या महज़ एक स्लोगन कहना देशभक्ति को बयान कर सकता है…. क्या किसी भी देशवासी को देशप्रेम साबित करने के लिए महज़ राजनीतिक  बयानबाजी करना शोभा देता है…. क्या माँ के सम्बोधन मात्र से देशप्रेम की भावना उज्जवल हो जाती हैतो क्या जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाए हो उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाए जाने चाहिए, 19 दिसंबर की यह तारीख हिंदुस्तान के इतिहास में  हमेशा अमर रहने वाला दिन हैइस दिन देशभक्ति की मिसाल उन तीन स्वतंत्रता सग्रामियों ने  अपना सब कुछ भारत के लिए न्यौछावर कर दियाउन तीनों में एक भारत से प्यार करने वाला ऐसा शख्स भी शामिल था जिसे फांसी के फंदों में झूलने से ज़्यादा अपने देश पर दोबारा न्यौछावर न हो पाने का अधिक दुःख था.

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, (22 अक्टूबर 1900 – 19 दिसंबर 1927) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थेउन्होंने काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई,  ब्रिटिश शासन ने उनके ऊपर अभियोग चलाया और 19 दिसंबर 1927 को उन्हें फैजाबाद जेल में फाँसी दी गयी,  राम प्रसाद बिस्मिल की भाँति अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ भी उर्दू भाषा के बेहतरीन शायर थेउनका पूरा नाम अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ वारसी हसरत था,  भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के सम्पूर्ण इतिहास में बिस्मिल और अशफ़ाक़ की भूमिका निर्विवाद रूप से हिन्दू-मुस्लिम एकता का अनुपम आख्यान हैअशफाक उल्ला खाँ ने राम प्रसाद बिस्मिल (जो शाहजहांपुर के प्रसिद्ध क्रांतिकारी और आर्य समाज के सदस्य थे) के साथ मित्रता कर लीउनकी आस्थाओं में मतभेद होने के बावजूद भी भारत को ब्रिटिश शासन के बंधनों से मुक्त कराना उनका प्रमुख उद्देश्य था, 8 अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों द्वारा एक बैठक आयोजित की गई थीजिसमें उन लोगों ने ट्रेन से ले जाए जा रहे हथियार को खरीदने के बजाय उस सरकारी खजाने को लूटने का फैसला किया थाइस प्रकार अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिलअशफाक उल्लाराजेन्द्र लाहिड़ीठाकुर रोशन सिंहशचीन्द्र बख्शीचंद्रशेखर आजादकेशव चक्रवर्तीबनवारी लालमुकुन्दी लालमनमथनाथ गुप्ता समेत कई उग्रवादियों के समूह ने ककोरी गाँव में सरकारी धन ले जाने वाली ट्रेन में लूटपाट की थीइस घटना को इतिहास में प्रसिद्ध काकोरी ट्रेन डकैती के रूप में जाना जाता है।

कस ली कमर अब तो कुछ कर के ही दिखाएंगे 

इस लूटपाट के कारण राम प्रसाद बिस्मिल को 26 सितंबर 1925 की सुबह पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया थाअशफाक उल्ला अभी भी फरार थेवह बिहार से बनारस के लिए चले गए और वहाँ जाकर उन्होंने इंजीनियरिंग कंपनी में काम करना शुरू कर दियाउन्होंने 10 महीने तक वहाँ काम कियाइसके बाद वह इंजीनियरिंग का अध्ययन करने के लिए विदेश जाना चाहते थे जिससे आगे चलकर उन्हें  स्वतंत्रता संग्राम में मदद मिल सकेअपने इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए वह दिल्ली भी गएअशफाक उल्ला खां ने अपने पठान मित्रों में से एक पर भरोसा किया जिसने उनकी मदद करने का नाटक किया था और बदले में उसने असफाक को पुलिस को सौंप दियाअशफाक उल्ला खाँ को फैजाबाद जेल में बन्द कर दिया गया था,  उनके भाई रियासतुल्लाह उनके वकील थे जिन्होंने इस मामले (केस) को लड़ा थाकाकोरी ट्रेन डकैती का मामला राम प्रसाद बिस्मिलअशफाक उल्ला खाँराजेंद्र लाहिड़ी और रोशन को मौत की सजा देने के साथ समाप्त हुआजबकि अन्य लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई,  अशफाक उल्ला खाँराम प्रसाद बिस्मिल और राजेंद्र लाहिड़ी को 19 दिसंबर 1927 को फांसी दी गई थी।

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