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सरकार मीडिया पर सेंसर लगाना चाहती है

कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए अपनी नाकामी छुपाने की कोशिश। देश में फैले कोरोना वायरस के संकमण से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारे देशवासियों को थाली व तालियां बजाने से लेकर रविवार को रात में बत्तियां बंद कर और दीपक जलाकर दीपावली मनाने के काम में लगा दिया था। बावजूद इसके कोरोना वायरस पर ऐसे किसी भी टोटके का असर नहीं हुआ। बल्कि उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐसी बचकानी हरकतें देखने और अपनी ताकत का गलत अंदाजा लगाने से नाराज़ हो कर आक्रमक रवैया अख्तियार कर लिया है। यही वजह है कि पिछले चौबीस घंटों के दौरान देश में कोरोना वायरस के लगभग सात सौ नए मामले सामने आए हैं और इसकी चपेट में आने वाले 32 लोगों ने दम तोड़ दिया है।
सरकार ने देश में कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए समय रहते आवश्यक सभी कदम न उठाने और जिस तबलीगी मरकज जमात को वह वायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहरा रही, उसके खिलाफ कार्रवाई में देरी करने और ऐसे ही दूसरे सवालों जिनसे प्रधानमंत्री मोदी की छवि ख़राब होती है से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कोरोना वायरस से संबंधित केवल सरकार की ओर जारी खबरें प्रकाशित वाले प्रसारित करने की अनुमति देने का अनुरोध किया है।
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि कोरोना वायरस के बारे में ग़ैर सरकारी समाचार प्रकाशित और प्रसारित होने से लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। साथ ही लोगों में सरकार के प्रति गलत धारणा पनप रही है। जिससे सरकार को कोरोना वायरस से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
अभी सरकार की इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई फैसला नहीं सुनाया है। मगर इससे यह तो साबित हो जाता है कि वह इस मुद्दे पर चर्चा से बचने के साथ ही लोगों को पूरी तरह से अंधेरे में रखना चाहती है।
दरअसल कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू में ही प्रभावी नीति बना कर उसे लागू करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है।
जब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के रूप में फैलती जा रही थी। तब भारत सरकार ने न तो इस वायरस से संक्रमित होने वालों की जांच करवाने की व्यवस्था की और न ही अस्पतालों में ही ऐसे मरीजों के इलाज के संबंध में उचित प्रबंध किए गए।
इतना ही नहीं सरकार कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए दिन रात एक कर काम करने वाले डॉक्टर, नर्स व अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए वायरस की चपेट में आने से बचने के लिए आवश्यक उपकरण भी मुहैया कराने में विफल रही।
कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए बिना किसी तैयारी के जल्दबाजी में पूरे देश में तीन हफ्ते के लिए लाक डाउन घोषित कर दिया गया। जिसकी वजह से लाखों प्रवासी मजदूर बेरोजगार होने के कारण सड़कों पर उतर आए। इस स्थिति से निपटने के लिए भी सरकार सही कदम उठाने में नाकाम रही। जब प्रवासी मजदूर पलायन कर रहे थे,तब राज्य सरकारें खासकर उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकार ने उनमें विश्वास की भावना पैदा करने के बजाय उनके लिए अपने घर लौटने के लिए बसों का प्रबंध कर स्थिति को और भी बिगाड़ दिया।
ऐसा ही दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी मरकज जमात के मामले में भी हुआ। सरकार ने न तो जमात में शामिल होने के लिए दूसरे देशों से दिल्ली के हवाई अड्डे पर आए लोगों को वहीं से उनके घर वापस भेजने और न ही उनके हवाई जहाज से उतरते ही जांच करवाने की व्यवस्था की।
इतना ही नहीं सरकार ने कर्फ्यू और लाक डाउन के दौरान बड़ी संख्या में तबलीगी मरकज जमात में शामिल लोगों को वहां से निकालने के लिए आवश्यक कदम ही उठाए।
दरअसल ऐसे बहुत से सवाल वाले शंकाएं हैं जो सरकार को कठघरे में खड़ा करतीं हैं। इनसे बचने के लिए ही सरकार खबरों पर सेंसरशिप लागू करना चाहती है।
लेकिन सवालों के जवाब तो उसे फिर भी देने ही होंगे।

आलोक गौड़

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