रमजान का उद्देश्य एवं संदेश

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-रविश अहमद-

रमजान एक महीने का वो पवित्र माह है जिसमें अल्लाह ने अपने बंदों को आदेशित किया है कि वह एक माह अर्थात चांद दिखने से अगले चांद दिखने तक रोजा रखें। इस रोजे के दौरान सूर्योदय से पहले से लेकर सूर्यास्त होने तक कुछ भी खाने पीने की मनाही है। अब सवाल यह उठता है कि एक माह तक अल्लाह का यह आदेश क्यों है जबकि इबादत तो हर रोज पांच वक्त की नमाज पढ़ने पर भी होती है। लेकिन अल्लाह ने जिस तरह पांच वक्त की नमाज को फर्ज अर्थात हर हाल में अदा करना जरूरी बताया है उसी प्रकार रोजा भी फर्ज किया गया है क्योंकि भूखा प्यासा अपने रब को याद करना एक बेहतरीन इबादत है।

सबसे अहम बात यह कि केवल भूखा प्यासा रहना ही आदेश नहीं है बल्कि इस दौरान आपको भूख और प्यास से यह महसूस होता है कि जिन लोगों के पास दो वक्त का खाना नहीं है, पीने का पानी नहीं है, उन लोगों पर क्या गुजरती होगी? पूरे साल आपने जो दौलत कमाई है उसका हिस्सा जकात के रूप में गरीबों में बांटना जरूरी है, इसके अलावा घर के प्रति सदस्य के हिसाब से फितरा मुस्तहिक गरीब को देना भी जरूरी है। पूरे दिन रोजेदार को किसी भी हालत में बदकलामी अर्थात गाली गलौज नहीं करनी है, गलत निगाह से किसी को नहीं देखना है, गलत बातें, झूठा वादा या झूठी बातें नहीं बोलनी नहीं सुननी हैं। बेवजह बाजारों में नहीं घूमना है और तमाम वो बातें जो आपको हर तरह की बुराई से रोकती हों उनका लगातार अमल करना। पड़ौस का खयाल रखना है, किसी को कोई परेशानी तो नहीं या आपकी वजह से कोई परेशान न हो। सभी एक जगह एक साथ परिवार में बैठकर सहरी और इफ्तार (भोजन) करें ताकि आपस में मुहब्बत बढ़े।

कुल मिलाकर सार यही है कि यह एक महीने की सख्त ट्रेनिंग है। जब आप एक महीने तक ये सभी काम निरंतर करेंगे तो निश्चित ही आपको इनकी आदत पड़ जाएगी फिर आप पूरे साल हर जरूरतमंद, परिवार के सदस्यों, पड़ौसियों और रिश्तेदारों सहित गरीबों का खयाल रखेंगे, आपकी जबान से गंदे अल्फाज निकलना बंद हो जाएंगे, आप किसी को गलत नजर से नहीं देखेंगे, भूखे प्यासे रहकर आपको गरीबों के हालात का हमेशा खयाल रहेगा। सच में रमजान एक ट्रेनिंग है, हम सबको पूरे हर्षो उल्लास के साथ अल्लाह के पवित्र आदेश का पालन करते हुए अपनी ट्रेनिंग पूरी कर साल भर इसको अमल में लाना चाहिए।

रमजान : खुदा का पाक महीना 

खुद को खुदा की राह में समर्पित कर देने का प्रतीक पाक महीना माह-ए-रमजान न सिर्फ रहमतों और बरकतों की बारिश का वकफा है बल्कि समूची मानव जाति को प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश भी देता है। मौजूदा हालात में रमजान का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। इस पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों का खजाना लुटाता है और भूखे-प्यासे रहकर खुदा की इबादत करने वालों के गुनाह माफ हो जाते हैं। इस माह में दोजख (नरक) के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत की राह खुल जाती है।

इस महीने में कुरान उतरना शुरू हुआ था। रमजान संयम और इबादत का महीना बताया गया है। इस महीने में प्रत्येक मुस्लिम रोजा यानी उपवास रखता है। रमजान आध्यात्मिक सक्रियता का एक महीना है, जिसका प्रथम उद्देश्य व्यक्ति की आध्यात्मिकता को जगाना है। रोजे का मुख्य उद्देश्य भौतिक चीजों पर मनुष्य की निर्भरता को कम करना और अपने आध्यात्मिक संकल्प को मजबूत करना है, ताकि वह पवित्रता के उच्च दायरे में प्रवेश कर सके।

अपनी प्रकृति से रोजा, धैर्य का एक अधिनियम है। धैर्य और सहनशीलता मनुष्य को ऐसी स्थिति में ले जाती है, जो उसे भगवान के निकटता की भावना का अनुभव करने में सक्षम बनाती है। रोजा व्यक्ति के दिल की आध्यात्मिक क्षमता को बढ़ाता है। इस्लाम के अनुसार, मनुष्य को इस दुनिया में परीक्षा के लिए भेजा गया है। खुदा ने हर एक इंसान को स्वतंत्रता दी है ताकि वह अपनी स्वतंत्र इच्छा के साथ खुदा के आदेशों का पालन करने में इस स्वतंत्रता का उपयोग कर सकें।

जीवन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए, मनुष्य को इस स्वतंत्रता के उपयोग को प्रतिबंधित करना भी जरूरी है। उसे जो अच्छा दिखे उसे बढ़ावा देना है और अपने अंदर की बुराइयों को खत्म करने की कोशिश करनी है। इसके लिए स्व-नियंत्रण की आवश्यकता है। रोजा इसी आत्म-नियंत्रण को प्राप्त करने के लिए वार्षिक प्रशिक्षण का एक रूप है। इस आत्म-नियंत्रित जीवन के लिए इंसान को धैर्य रखना जरूरी है। रोजा इंसान के अंदर की धैर्य की भावना को पैदा करता है।

इसी कारण से रमजान के महीने को हजरत मुहम्मद सल्लाहो अलैहि वसल्लम ने धैर्य का महीना बताया है। इस्लाम में कामयाब जीवन जीने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात धैर्य बताई गई है। जैसे परीक्षा में एक जटिल सवाल का उत्तर ढूंढने के लिए धैर्य चाहिए उसी प्रकार से जीवन के जटिल सवालों के उत्तर के लिए भी व्यक्ति को धैर्य चाहिए। हजरत मुहम्मद सल्लाहो अलैहि वसल्लम ने कहा था रमजान का महीना सहानुभूति का महीना है।

उपवास एक आदमी को सिखाता है कि बुनियादी मानव आवश्यकताएं क्या हैं। यह उसे बताता है कि भूख क्या है और प्यास क्या है। जिन लोगों को भूख या प्यास महसूस करने का मौका नहीं मिलता है, वे भी इस महीने के दौरान भूख-प्यास को अनुभव करते हैं। कुछ घंटों तक, अमीर भी उसी परिस्थितियों में रहने के लिए बाध्य होते हैं, जिसमें एक गरीब व्यक्ति रहता है। इस प्रकार रमजान एक आस्तिक के कायाकल्प की प्रक्रिया है।

वह रमजान के दौरान रोजमर्रा सीखे हुए पहलुओं को अपनी रोजाना की जिंदगी में लागू करने के लिए तत्पर हो जाता हैं। एक व्यक्ति जो सच्ची भावना से रोजा रखता है वह रमजान के बाद अपने जीवन में एक बड़ा परिवर्तन स्वयं देख पाता है, वह जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार हो चुका होता है, उसके दिल में किसी के लिए द्वेष नहीं रहता, वह दूसरों की भूख प्यास का वैसे ही सम्मान करता है, जैसा रोजे में उसने अहसास किया होता है, वह अपने से यह वादा करता है कि वे समाज में एक नो-प्रॉब्लम व्यक्ति बनके रहेगा ना की प्रॉब्लम व्यक्ति।

क्या हैं रमजान का महीना : यह मुस्लिम संस्कृति का एक बहुत ही महान महीना होता है, जिसके नियम बहुत कठिन होते हैं, जो इंसान में सहन शीलता को बढ़ाते हैं। रमजान का महिना बहुत ही पवित्र माना जाता हैं, यह इस्लामिक केलेंडर के नौवें महीने में आता हैं। मुस्लिम धर्म में चाँद का अत्याधिक महत्व होता हैं। इस्लामिक कैलेंडर में चाँद के अनुसार महीने के दिन गिने जाते हैं, जो कि 30 या 29 होते हैं, इस तरह 10 दिन कम होते जाते हैं जिससे रमजान का महीना भी अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक प्रति वर्ष 10 दिन पहले आता हैं। रमजान के महीने को बहुत ही पावन माना जाता हैं। रमजान अपने कठोर नियमो के लिए पूरे विश्व में जाना जाता हैं। रमजान के दिनों की चमक देखते ही बनती हैं। पूरा महीना मुस्लिम इलाको में चमक- दमक एवम् शोर शराबा रहता हैं। सभी आपस में प्रेम से मिलते हैं। गिले शिक्वे भुलाकर सभी एक दूसरे को अपना भाई मानकर रमजान का महीना मनाते हैं।

रमजान का इतिहास : इस पाक महीने को शब-ए-कदर कहा जाता हैं। मान्यता यह हैं कि इसी दिन अल्लाह ने अपने बन्दों को कुरान शरीफ से नवाजा था। इसलिए इस महीने को पवित्र माना जाता हैं और अल्लाह के लिए रोजा अदा किया जाता है, जिसे मुस्लिम परिवार का छोटे से बड़ा सदस्य पूरी शिद्दत से निभाता हैं।

रमजान का समय : रोजे के समय को तीन भागो में बांटा गया है-

  • सहरी : सहरी का अपना एक महत्व होता है यह सुबह के वक्त से पहले का भी वक्त होता है, इसमें सूर्य उदय होने के दो घंटे पहले जगना होता है और कुछ खाने के बाद रोजा शुरू होता है। इसके बाद पूरा दिन कुछ भी खाया या पीया नहीं जाता।

  • इफ्तार : शाम को सूरज डूबने के बाद कुछ समय का अंतराल रखते हुए रोजा खोला जाता है जिसका एक वक्त निश्चित होता है।

  • तरावीह : रात को एक निश्चित समय पर नमाज अदा की जाती है। लगभग रात नौ बजे मस्जिदों में कुरान पढ़ी जाती है। यह सिलसिला पूरे रमजान (30 दिन) चलता है और फिर ईद का जश्न मनाया जाता है।

रमजान के नियम : रमजान के नियम बहुत ही कठिन होते हैं। कहा जाता हैं इससे इंसान और अल्लाह के बीच की दूरी कम होती हैं। इन्सान में धर्म के प्रति भावना बढ़ती हैं, साथ ही अल्लाह पर विश्वास पक्का होता हैं। रमजान में एकता की भावना बढ़ती है।

अल्लाह का नाम लेना, कलाम पढ़ना : रमजान में रोजा रखा जाता है, जिसमे अल्लाह का नाम लिया जाता हैं। नमाज अदा की जाती है, साथ ही कलाम भी पढ़ा जाता हैं।

गलत आदतों से दूर रहे : रमजान के पूरे महीने गलत आदतों से दूर रहने की हिदायत दी जाती है, जिसके लिए खास निगरानी भी रखी जाती है। किसी भी तरह के नशे से दूर रहने की सख्ती की जाती हैं। यहाँ तक कि गलत देखने, सुनने एवम बोलने तक की मनाही की जाती हैं। शराब एवम् अन्य किसी नशे की मनाही रहती हैं।

मारा-पीट करना भी गलत माना जाता हैं : रमजान के दिनों में किसी भी तरह की लड़ाई को गलत माना जाता हैं। हाथ पैर का गलत इस्तेमाल रमजान के नियमों का उलंघन हैं। यहाँ तक की किसी लड़ाई को देखना भी गलत समझा जाता हैं।

महिलाओं के प्रति अच्छी भावना–  पराई महिलाओं को बुरी नज़र से देखना एवम् छूना निहायती बुरा समझा जाता हैं।

नेकी का रास्ता दिखाया जाता हैं : रमजान में दान का महत्व है, जिसे जकात कहते हैं। सभी को अपनी श्रद्धा एवम् स्थिती अनुसार नेक कार्य करना होता हैं। रोजाना किये जाने वाले नेक कार्यों को बढ़ाने को कहा जाता हैं।

अस्त्गफार करे : रमजान में लोगो को उनके गुनाह मानने को कहा जाता है, जिससे वे अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांग सके। जिससे उसके दिल का भार कम होता है, अगर वो अपनी गलती की तौबा करता है, तो उसे उसका अहसास होता है और वो आगे से ऐसा नही करता।

जन्नत की दुआ : रमजान में लोग जन्नत की दुआ करते है, जिसे जन्नतुल फिरदौस की दुआ करना कहा जाता है, इसे जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान माना जाता है।

रोजा की छूट : मुस्लिम परिवार में हर एक व्यक्ति रमजान में रोजा रखता है, लेकिन कुछ विशेष कारणों के कारण छुट भी दी जाती है। लेकिन शायद यह छुट सभी देशों में नहीं मानी जाती।

  • पाँच साल से छोटे बच्चे को रोजा की मनाही होती हैं।

  • बहुत बुजुर्ग को भी रोजा में छुट मिलती हैं।

  • अगर कोई बीमार है, तो रोजा खोल सकता हैं।

  • गर्भवती अथवा बच्चे को दूध पिलाने वाली महिला को रोजे की मनाही होती हैं। 


रमजान के महीने का महत्व : रमजान लोगो में प्रेम और अल्लाह के प्रति विश्वास को जगाने के लिए मनाया जाता हैं। साथ ही धार्मिक रीति से लोगो को गलत कार्यों से दूर रखा जाता है, साथ ही दान का विशेष महत्व होता हैं। जिसे जकात कहा जाता हैं। गरीबो में जकात देना जरुरी होता हैं। साथ ही ईद के दिन फितरी दी जाती हैं यह भी एक तरह का दान होती हैं। यह था रमजान का महत्व। मुस्लिम समाज में रमजान की चमक देखते ही बनती हैं। साथ ही इसे पूरा समाज मिलजुलकर करता हैं। इस्लाम धर्म के मुताबिक मुसलमान का मतलब मुसल-ए-ईमान होता हैं अर्थात जिसका ईमान पक्का हो। जिसके लिए उन्हें कुछ नियमों को समय के साथ पूरा करना होता हैं तब ही वे असल मायने में मुसलमान कहलाते हैं जिनमे-

  • अल्लाह के अस्तित्व में यकीन।

  • नमाज

  • रोजा

  • जकात

  • हज शामिल है

यह सभी दायित्व निभाने के बाद ही इस्लाम के अनुसार वह व्यक्ति असल मुसलमान कहलाता हैं। रमजान को बरकती का महीना कहा जाता हैं। इसमें खुशियाँ एवम् धन आता हैं। साथ ही एकता का भाव बढ़ता हैं। आपसी बैर कम होते हैं। रमजान भी एक ऐसा त्यौहार है, जो एकता और प्रेम ही सिखाता हैं। इस तरह देखे तो दीपावली और रमजान में क्या भेद देखेंगे? लेकिन सदियों से चली आ रही हैं यह हिन्दू- मुस्लिम की लड़ाई अल्लाह और ईश्वर के अपने बच्चों के प्रति समान प्रेम तक को अनदेखा कर देती हैं।

रमजान में होते हैं 3 अशरे, हर अशरे का है अलग महत्व  : रमजान का महीना हर मुसलमान के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, जिसमें 30 दिनों तक रोजे रखे जाते हैं। इस्लाम के मुताबिक, पूरे रमजान को तीन हिस्सों में बांटा गया है, जो पहला, दूसरा और तीसरा अशरा कहलाता है। अशरा अरबी का 10 नंबर होता है। इस तरह रमजान के पहले 10 दिन (1-10) में पहला अशरा, दूसरे 10 दिन (11-20) में दूसरा अशरा और तीसरे दिन (21-30) में तीसरा अशरा बंटा होता है।

इस तरह रमजान के महीने में 3 अशरे होते हैं। पहला अशरा रहमत का होता है, दूसरा अशरा मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का होता है और तीसरा अशरा जहन्नम की आग से खुद को बचाने के लिए होता है। रमजान के महीने को लेकर पैगंबर मोहम्मद ने कहा है, रमजान की शुरुआत में रहमत है, बीच में मगफिरत यानी माफी है और इसके अंत में जहन्नम की आग से बचाव है। रमजान के शुरुआती 10 दिनों में रोजा-नमाज करने वालों पर अल्लाह की रहमत होती है। रमजान के बीच यानी दूसरे अशरे में मुसलमान अपने गुनाहों से पवित्र हो सकते हैं। वहीं, रमजान के आखिरी यानी तीसरे अशरे में जहन्नम की आग से खुद को बचा सकते हैं।

रमजान के 3 अशरे और उनका महत्व-
1. रमजान का पहला अशरा 
रमजान महीने के पहले 10 दिन रहमत के होते हैं। रोजा नमाज करने वालों पर अल्लाह की रहमत होती है। रमजान के पहले अशरे में मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा दान कर के गरीबों की मदद करनी चाहिए। हर एक इंसान से प्यार और नम्रता का व्यवहार करना चाहिए।

2. रमजान का दूसरा अशरा
रमजान के 11वें रोजे से 20वें रोजे तक दूसरा अशरा चलता है। यह अशरा माफी का होता है। इस अशरे में लोग इबादत कर के अपने गुनाहों से माफी पा सकते हैं। इस्लामिक मान्यता के मुताबिक, अगर कोई इंसान रमजान के दूसरे अशरे में अपने गुनाहों (पापों) की माफी मांगता है, तो दूसरे दिनों के मुकाबले इस समय अल्लाह अपने बंदों को जल्दी माफ करता है।

3. रमजान का तीसरा अशरा 
रमजान का तीसरा और आखिरी अशरा 21वें रोजे से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29वें या 30वें रोजे तक चलता है। ये अशरा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। तीसरे अशरे का उद्देश्य जहन्नम की आग से खुद को सुरक्षित रखना है। इस दौरान हर मुसलमान को जहन्नम से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए। रमजान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम मर्द और औरतें एहतकाफ में बैठते हैं। बता दें, एहतकाफ में मुस्लिम पुरुष मस्जिद के कोने में 10 दिनों तक एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं, जबकि महिलाएं घर में रहकर ही इबादत करती हैं।   

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