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अहिल्यादेवी होल्कर” की जयंती के शुभ अवसर पर श्रध्दा सुमन अर्पित – कैलाश चन्द मिश्रा

“अहिल्यादेवी होल्कर” जी की जयंती के शुभ अवसर पर “ब्रह्म सेना दल” के राष्ट्रीय महासचिव – कैलाश चन्द मिश्रा ने समस्त देशवासियों को शुभ कामनाएँ देते हुए कहा कि अहिल्यादेवी होल्कर के कुशल नेतृत्व व प्रशासन के कारण प्रजा ने उन्हें देवी की उपाधि दी। जिसके बाद उन्हें अहिल्यादेवी होलकर पुकारा जाने लगा। वे “सनातनी हिन्दुत्वनिष्ठ” महारानी के रूप में विख्यात हुईं।

अहिल्याबाई का जन्म 1725 में मह के वर्तमान अहमदनगर जिले के जामखेड़ तहसील के चौंडी ग्राम में मणकोजी शिंदे के घर में हुआ।
24 मार्च, 1754 को कुंभेरी की लड़ाई में युद्ध के दौरान पति को वीरगति प्राप्त होने के बाद अहिल्याबाई ने सती होने का निश्चय किया। किंतु उनके ससुर मल्हारराव ने मना कर दिया और साम्राज्य संभालने के लिए अहिल्याबाई को मनाया।11 दिसम्बर, 1767 को रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा की महारानी बनीं।रानी अहिल्यादेवी होल्कर ने भारत के भिन्न-भिन्न भागों में अनेक मन्दिरों, धर्मशालाओं और अन्नसत्रों का निर्माण कराया था।अहिल्यादेवी होल्कर “सनातनी हिन्दुत्वनिष्ठ” महारानी के रूप में विख्यात हुईं। उन्होंने अपने शासनकाल में अनेक धार्मिक कार्यों को पूरा किया।खोयी प्रतिष्ठा पुनः प्रस्थापित करने के लिए अहिल्याबाई गोहाड का किला जीतकर युद्ध क्षेत्र में अपनी प्रथम जीत शान से लिखीं। उनकी धार्मिकता के बाद लोगों ने उनकी वीरता भी देखी।

देवी अहिल्याबाई होल्कर न्याय के प्रति बहुत सजग रहती थीं। उन्होंने अपने राज्य में नियमबद्ध न्यायालय बनवाये थे। गाँवों में पंचायत को न्यायदान के व्यापक अधिकार दिये थे।अहिल्याबाई होल्कर ने महिला सशक्तिकरण के लिए विधवा महिलाओं को उनका हक दिलवाने के लिए कानून में बदलाव किया। विधवा महिलाओं को उनके पति की संपत्ति को हासिल करने का अधिकार दिलावाया।
अहिल्याबाई होल्कर के शासन में इंदौर एक छोटे से गांव के स्थान पर फलते-फूलते शहर में स्थापित हो गया। मालवा में किले, सड़कें बनवाने का श्रेय अहिल्याबाई को ही जाता है।अहिल्याबाई होल्कर ने द्वारिका, रामेश्वर, बद्रीनारायण, सोमनाथ, अयोध्या, जगन्नाथ पुरी, काशी, गया,

मथुरा, हरिद्वार, आदि स्थानों पर कई प्रसिद्ध एवं बड़े मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया और धर्मशालाओं का निर्माण करवाया।रानी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने शासनकाल में सिक्कों पर ‘शिवलिंग और नंदी’ अंकित करवाईं। वह परम शिवभक्त थीं।अहिल्याबाई राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करते समय अपना नाम कभी नहीं लिखती थी। अपने नाम के स्थान पर “श्रीशंकर लिख” देती थीं।रानी अहिल्याबाई होल्कर की ऐतिहासिक शासनकाल के आधार पर ही भारत सरकार ने सम्मान में 25 अगस्त, 1996 को उनके नाम पर एक “डाक टिकट” भी जारी किया।
आज देश में अहिल्याबाई होल्कर के नाम पर विश्वविद्यालय, एयरपोर्ट और कई संस्थान हैं।रानी अहिल्यादेवी होल्कर 13 अगस्त, 1795 श्रावण कृष्ण चतुर्दशी को ”गंगा जल सम निर्मल जीवन शिवनाम” का स्मरण करते हुए शिवप्रवाह में विलीन हो गईं। महेश्वर में नर्मदा के पवित्र किनारे पर उनका पार्थिव शरीर अग्नि-समर्पण किया गया।अहिल्याबाई ने बार-बार अपने अधिकारी नहीं बदले, परन्तु किसी का एकाधिकार न हो इसके बारे में भी वह हमेशा सतर्क रहती थीं।

अहिल्याबाई होल्कर के शासन में “किसान सुखी तो देश सुखी” यह धारणा होने के कारण उन पर बोझिल कर नहीं लगाये थे। वर्षा की कमी या अकाल होने पर भी कर माफ किया जाता था|अहिल्याबाई होल्कर ने बार-बार युद्ध नहीं किया। चन्द्रावत द्वारा होलकर शासन से विद्रोह के कारण उसके व अहिल्याबाई के बीच युद्ध हुआ। इसमें अहिल्याबाई विजयी हुई थीं।देवी अहिल्याबाई न्याय के प्रति बहुत सजग रहती थीं। उन्होंने अपने राज्य में नियमबद्ध न्यायालय बनवाये थे। गाँवों में पंचायत को न्यायदान के व्यापक अधिकार दिये थे।देवी अहिल्याबाई ने विधवाओं को पुत्र गोद लेने का हकदार बनाया। इससे पहले विधवाओं के पति की संपत्तियां राजकोष में जमा करा ली जाती थीं और पुत्र गोंद लेने का विधान नहीं था।देवी अहिल्याबाई होल्कर ने कलकत्ता से काशी तक सड़क निर्माण करवाया। इसके अलावा उन्होनें गया में विष्णु मन्दिर व काशी (वाराणसी) में अन्नपूर्णा मन्दिर बनवाए।देवी अहिल्याबाई ने यात्रियों से जंगल से गुजरते समय एक कौड़ी कर के रूप में लेने की व्यवस्था शुरु की गयी, जो ‘भीलकौड़ी’ नाम से प्रसिद्ध है।1783 में देवी अहिल्याबाई ने डाक व्यवस्था की शुरूआत की। महेश्वर से पुणे तक डाक व्यवस्था चलाने का दायित्व पदमसी नेन्सी नामक कम्पनी को सौंपा गया था।

देशभर में विभिन्न स्थानों पर देवी अहिल्याबाई धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, प्याऊ, कुएं, नदियों पर घाट जैसी अनेक सुविधाएं उपलब्ध करा दीं। इससे यात्रियों की यात्रा सुलभ हुई।बद्रीनारायण से लेकर रामेश्वर तक, द्वारका से लेकर भुवनेश्वर तक अनेक मन्दिरों का पुनर्निर्माण अहिल्याबाई ने किया।देवी अहिल्याबाई के राज्य में सामान्य कलाकारों का भी ध्यान रखकर सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। बुनकर उद्योग को प्रोत्साहन स्वरूप अन्न, वस्त्र, निवास, उद्योग के लिए धन एवं तैयार कपड़ा बेचने की भी व्यवस्था हुई।

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