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महिलाओं के अधिकार के लिए शाहबानो का संघर्ष एक मिसाल

नई दिल्ली || 1978 में तीन तलाक का शिकार हुई शाहबानों की बदौलत ही आज देश में मुस्लिम महिलाओं को वह हक़ मिला जिसकी समाज सदियों से अवहेलना करती आ रही थी। तलाक-ए-बिद्दत धीरे-धीरे मुस्लिम महिलाओं के लिए अभिशाप बनती जा रही था। शौैहर बिना इसके मर्म को समझे ही कहीं भी कभी भी तीन तलाक बोलकर दोनों के ताल्लुकात को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करने पर तत्पर थे। वहीं कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्हें अपनी गलती का अहसास हो जाता था लेकिन शौहर के पछतावे के लिए एक महिला को बहुत कुछ सहना पड़ता था जसमें से एक हलाला निकाह करना भा शामिल था। शायद इसी सब को भांपते हुए शाहबानो ने यह कदम उस वक्त उठाया जब किसी ने इसकी कल्पना करने की जुर्रत भी की थी। शाहबानो द्वारा छेड़ी गई चिंगारी ने धीरे-धीरे क्रांति का रूप लिया और देश की करोड़ो महिलाओं को उनका हक मिला।  
 

लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी आखिरकार तीन तलाक विधेयक पास हो गया। बात-बात पर तीन तलाक कहकर रिश्तों को खत्म करने तैश पर अब कानून की मुहर लग गई है, इस विधेयक पर राष्ट्रपति की मुहर लगते ही एक बार में तीन तलाक देना अपराध की श्रेणी में आ जाएगा।  बिल के पक्ष में 99 और विरोध में 84 वोट पड़े। मुस्लिम महिला (शादी पर अधिकारों की सुरक्षा) विधेयक, 2019 अब कानून का रूप लेगा। अब मौखिक, लिखित या किसी भी अन्य माध्यम से तीन तलाक देना कानूनन अपराध होगा। मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में सरकार की यह जीत, मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली महिला शाहबानो की जीत है। 

 
शाहबानों आज हमारे बीच नहीं है। उनके संघर्ष की सीमा को हम अंदाजा तक नहीं लगा सकते। मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद ने 62 वर्ष की उम्र में तलाक दे दिया था। उनके शौहर ने 1978 में ही तीन तलाक कहते हुए उनको घर से निकाल दिया था। मुस्लिम पारिवारिक कानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्जी के खिलाफ ऐसा करने को स्वतंत्र था।  शाहबानो उस वक्त पांच बच्चों की मां थीं। बच्चों और अपनी जीविका का कोई साधन न होने से पति से गुजारा लेने के लिए शाह बानो अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही सात साल लग गए। 
 
सुप्रीम कोर्ट में जब फैसला शाहबानों के पक्ष में सुनाया गया और संसद को इसके लिए कानून बनाने के निर्देश दिए गए बावजूद इसके तीन बार लोकसभा में पास होने के बाद राज्यसभा में हर बार यह बिल पास नहीं हो सका। शाहबानों ने आखिरी दम न्याय की आस को अपने सीने में संजोय रखा और आखिरकार उन्हें इस संघर्ष में जीत भी मिली लेकिन अफसोस कि जीत का जश्न मनाने और अपनी कोशिशों का असर देखने के लिए शाहबानों हमारे बीच नहीं है। 

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