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It is important to bring the Corona-affected education system back on track
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कोरोना एवं शिक्षा प्रणाली

आज कोरोना महामारी के चलते पूरे विश्व मे आर्थिक संकट आ चुका है। लोगों के व्यापार को इस महामारी और महामारी के चलते लॉकडाउन से भारी नुक्सान हुआ है। अनलॉक -1 ने व्यापार क्षेत्र मे एक उम्मीद तो पैदा की है, पर शिक्षा के क्षेत्र मे ना तो कोई अनलॉक आया और ना ही निकट भविष्य मे इसकी कोई उम्मीद नज़र आ रही है।
एक ओर जहाँ शिक्षक वर्ग दिन रात मेहनत कर रहा है अपने विद्यालय या कोचिंग सेंटर के बच्चो को पढ़ाने के लिए डिजिटल माध्यम पर नोटस बनाना, पॉवर पॉइंट प्रेसेंटटेशन आदि बनाना दूसरी ओर अभिभावक वर्ग  नो स्कूल नो फीस जैसे नारों को बुलंद करता नज़र आ रहा है। ऐसे मे शिक्षक वर्ग के लिए कई मुश्किलें खड़ी होती नज़र आ रही हैं।

कई निजी शिक्षण संस्थानो ने यह कहते हुए अपने हाथ खड़े कर दिये हैं, के जब तक स्कूल को फीस नही आयेगी हम अध्यापको को सैलरी नहीं दे पाएंगे। आर्थिक महामंदी के इस परिवेश मे जहाँ देश मे 14 करोड़ लोग अपनी नौकरियों से हाथ धो बैठे हैं अगर

शिक्षक वर्ग विरोध करे तो नौकरी से जाए और ना करे तो घर कैसे चलाये।

अभिभावक वर्ग एक ओर अपनी संतान को शिक्षा से जोड़े रखना चाहता है पर उसके लिए कुछ स्कूल को कोई भुगतान करना नहीं चाहता। अनलॉक -1 मे लगभग सभी क्षेत्र खोल दिये गए है अर्थात लोगों की आजीविका के साधन तो बन गए हैं पर शिक्षा के क्षेत्र मे ना तो किसी सरकार द्वारा कोई फंड जारी किया गया और ना ही अभिभावक ऑनलाइन क्लास मे की गयी शिक्षकों द्वारा मेहनत के लिए भुगतान करने को तैयार है।

सरकारी निर्देशों के अनुसार जुलाई मे शिक्षण संस्थान खुलने की संभावनाओ पर एक सर्वे मे 72 प्रतिशत अभिभावकों ने आपति दर्ज करी एवं बच्चो को स्कूल ना भेजने की बात रखी। यहाँ तक की इस सेशन को ज़ीरो सेशन घोषित करने की मांग रखी।

इस द्वंद की स्थिति ने कई प्रश्न खड़े कर दिये हैं।

क्या अभिभावक अपने बच्चे को एक पुरा साल ना पढ़ा कर बच्चे को शिक्षा से दूर करना चाहते हैं?
और अगर नहीं तो नो स्कूल नो फीस जैसे नारों का क्या मतलब? सरकारी तंत्र भी इस स्थिति मे हाथ बांधे खड़ा है।

शिक्षक की कलम से

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