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बाबरी मस्जिद विध्वंस प्रकरण पर नौ महीने के भीतर फैसला सुनायें

नई दिल्ली || अयोध्या में 1992 में राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील बाबरी मस्जिद गिराये जाने से संबंधित मुकदमे की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश से उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस प्रकरण में आज से नौ महीने के भीतर फैसला सुनाया जाए। बता दें कि इस मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, डा. मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और कई अन्य नेता आरोपी हैं। न्यायमूर्ति रोहिंग्टन नरिमन और न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने कहा कि इस मामले में गवाहों के बयान दर्ज करने का काम छह महीने के भीतर पूरा किया जाए। पीठ ने उप्र सरकार को इस मुकदमे की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश का कार्यकाल नौ महीने बढ़ाने के बारे में चार सप्ताह के भीतर उचित आदेश पारित करने का भी निर्देश दिया।

न्यायालय ने कहा था कि विशेष न्यायाधीश दो साल तक नियमित सुनवाई के बाद अब अंतिम चरण में हैं और उन्हें सुनवाई पूरी करके फैसला सुनाने के लिये छह महीने का वक्त और चाहिए। शीर्ष अदालत ने अयोध्या में मुगलकालीन इस ढांचे को गिराये जाने को ‘अपराध’ बताते हुए कहा था कि इसने संविधान के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को हिला कर दिया है। न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में अतिविशिष्ट आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोप बहाल करने की सीबीआई को अनुमति दे दी थी। शीर्ष अदालत ने इस मुकदमे की सुनवाई में 25 साल के विलंब के लिये सीबीआई को आड़े हाथ लिया था और कहा था कि वह इन आरोपियों पर मुकदमे की संयुक्त सुनवाई के लिये गंभीरता से प्रयास नहीं कर रही है और एक तकनीकी त्रुटि, जिसे सहजता से दूर किया जा सकता था, को राज्य सरकार ऐसा नहीं कर रही है।
शीर्ष अदालत ने रायबरेली में विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आडवाणी और अन्य के खिलाफ लंबित कार्यवाही को लखनऊ में अयोध्या मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश की अदालत में स्थानांतरित कर दिया था। न्यायालय ने कहा था कि सत्र अदालत सीबीआई द्वारा दाखिल संयुक्त आरोप पत्र में नामित व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (साजिश) और दूसरे दंडात्मक प्रावधानों के तहत अतिरिक्त आरोप निर्धारित करेगी। शीर्ष अदालत ने आडवाणी और अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने के आरोप हटाने संबंधी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 12 फरवरी, 2001 के फैसले को त्रुटिपूर्ण बताया था।

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