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Discussion of incarnations of god
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भगवान के अवतारो की चर्चा :- प लक्ष्मी नारायण मिश्र

उस परम तत्व का विविध रूपो मे अवतार हुआ।

और यहाँ सूत जी महराज ने चौबीस अवतारों का निरूपण किया,

जिनकी चर्चा आगे के प्रसंगो मे विस्तार से की गाई है।

शौनक जी ने पूछा महराज इस भागवत की रचना किसने की, कब की, कहाँ की, क्यों की।

द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीए युगपर्यये।

जात: पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरे:।।

सूत जी कहते है।

जिस समय द्वापर के अन्त मे भगवान के कला अवतार श्रीकृष्ण द्वैपायन्ं वेद्व्ब्यास जी का प्राक्ट्य हुआ, तब अपनी दिब्य दृस्टि से भभिस्य पर दृस्टिपात करके देखा तो कलिकाल के कलुसित प्राणियो को देखकर चित्त अशांत हो गया ।

मन्दा सुमन्दमतयो मन्दभाज्ञा ह्रूप्द्रुता।।

जीवों का कैसे कल्याण होगा।

इसलिए ब्यास जी महराज ने उन सबका ध्यान रखते हुए वेदों की रचना की।

पुराणो की रचना की परन्तु मन मे शान्ती नही हुई और बिचार करने लगे अब क्या किया जाय।।

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