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उसका बेड़ा पार है, स्वर्ग है उसकी ठाँव

आदरणीय मित्रों, लौकडाऊन कि स्थिति को ध्यान में रखते हुए (मांटी की सुगंध) समूह के बैनर तले दिनांक 12/05/2020 को समय शाम 4 बजे से 6 बजे तक, देश के वरिष्ठ ग़ज़लकार, गीतकार आदरणीय डा. जय सिंह आर्य जी की अध्यक्षता में, द्वितीय आनलाइन कविसम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसका विषय पिता की महानता को रखा गया था। कवि सम्मेलन के मुख्य अतिथि रहे वरिष्ठ गीत व ग़ज़लकार श्री आज़ाद कानपुरी जी, कवि सम्मेलन को सानिध्य प्राप्त हुआ सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार श्री अनुपिन्दर सिंह अनूप जी का तथा बहुत ही सुंदर संचालन किया कवियत्री डा. सीमा विजयवर्गीय जी ने। अध्यक्षता कर रहे आदरणीय डा. जयसिंह आर्य जी ने अपने दोहे से सभी मंत्रमुग्ध कर दिया। दोहे कुछ इस प्रकार थे

उसका बेड़ा पार है, स्वर्ग है उसकी ठाँव।

धोधो कर जिसने पिये, मातपिता के पाँव।।

संचालन कर रही डा. सीमा विजयवर्गीय ने जिस अंदाज में पिता को समर्पित पंक्तियाँ पढ़ी वह श्रोताओं के दिलो दिमाग में उतरतीं चलीं गईंं।—–

मेरी आँख का वो तारा किधर है।

मेरा लाडला वो दुलारा किधर है।।

जिगर का वो टुकड़ा रखे दूरियाँ अब।

वो बचपन का प्यारा सितारा किधर है।।

कवि व गीतकार हरेन्द्र प्रसाद यादव फ़कीर ने अपनी कविता को अपने बेहतरीन तरन्नुम मे पेश कर श्रोताओं का मन मोह लिया। उनकी कुछ पंक्तियां

आन पिता जी  शान  पिता जी।

बच्चों  के  अभिमान पिता जी।।

जिनके  हाथ  सनाथ है जीवन।

होते    हैं  भगवान  पिता  जी।।

कवियत्री सरिता गुप्ता ने बहुत ही मार्मिक अंदाज़ में अपनी कविता पढ़ी—-

बचपन में आप से ही।

सीखा लिखना ,पढ़ना।।

और कहनाअपनी बात।

सीखा समझना पहेलियांँ।।

कवियत्री अराधना सिंह ने भी अपनी पंक्तियाँ पिता को समर्पित किया।—-

रोशनाई भरी भाव की जब कभी,         

लेखनीहोविकलडगमगानेलगी।

गीत लिखने पिता पर चली जब कभी     

लिखते लिखते नज़र डबडबाने लगी।

पानीपत हरियाणा से पधारे कवि श्री भारत भूषण जी ने अपना काव्य पाठ कुछ इस अंदाज किया—-

कष्टों को झेले पिता।

निकले कभी न चीख।।

भूषणदेता पुत्र को।

सहनशक्ति की सीख।।

कवियत्री मोनिका शर्मा के काव्य पाठ का अंदाज भी सराहनीय रहा—–

मातपिताकेचरणोमें

होते हैं चारों धाम।

थाम कर उंगली चलना सीखा

करके आंगन को प्रणाम।।

कवि धर्मेंद्र जैन के कविता की पंक्तियां कुछ यूँ थीं।——

पिता के मार्गदर्शन में,सदा सुखसार होता है।पिता कर्तव्य पालन का,प्रमुख आधार होता है।

पिता का नाम ही जग में हमें पहचान देता है।पिता बच्चों की खुशयों का,अमिट भंडार होता है।।

कवियत्री रजनी श्रीवास्तव जी ने अपनी कविता में अपना दर्द कुछ यूँ बयां किया।——

पिता अनमोल हैं हमको, हमें दुनियां में लाते हैं।

राह जीने की हो कैसी, हमें वे ही सिखाते हैं।।

अधूरे हों भले सपनें मगर अफ़सोस नरजनी

हमारी आँखों में सपनें पिता जी ही सजाते हैं।।

कविसम्मेलनमेंजिनकवियोंनेपितापरसुन्दरकाव्यपाठकियाउनमेंप्रमुखरहेश्रीगुलशनमदानमुंबई, अनिल पोपट शामली, अनुजा वाजपेई लखनऊ, मोनिका शर्मा गुरुग्राम सुदेश यादव दिव्य मेरठ, सतीश वर्धन पिलखुवा प्रमुख रहे।

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