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Industry is on ventilator, it needs oxygen but government is giving fever medicine
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उद्योग जगत वेंटिलेटर पर है, उसे आक्सीजन के बजाय सरकार दे रही है बुखार की दवा

नैशनल थॉट्स ब्यूरो :- कोरोना संकट के समय में भारतीय अर्थव्यवस्था मरणासन्न अवस्था में वेंटिलेटर पर है और जीवित रहने के लिए आक्सीजन की जरूरत है। मगर सरकार उसे बुखार उतारने की दवा देकर यह उम्मीद कर रही है कि वह शीघ्र ही ठीक हो कर पहले से भी ज्यादा तेज रफ्तार से दौड़ने लगेगी।कोरोना वायरस से निपटने के लिए लागू किए गए देशव्यापी लाक डाउन के लगभग पचास दिन बीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत 20 लाख करोड़ रुपए का भारी भरकम पैकेज देने की घोषणा की।

जिसे सुनकर सूक्ष्म,लघु, मध्यम व कुटीर उद्योगों के उद्यमियों में आशा की उम्मीद जगी थी कि अब वह उद्योग धंधे सुचारू रूप से चला सकेंगे। मगर उसके अगले दिन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जिस प्रकार से सूक्ष्म,लघु और मध्यम आकार के उद्यमियों को राहत देने वाले जिस प्रकार के पैकेज की घोषणा की। उससे उनकी आशाओं पर पानी फिर गया है।वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से की गई घोषणाओं पर टिप्पणी करते हुए फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो,स्माल, एंड मीडियम इंटरप्राइजेज के अध्यक्ष अभिनेष सक्सेना ने कहा कि इस वक़्त भारतीय अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें ले रही है। उसे बचाने के लिए आक्सीजन देने की जरूरत है। मगर सरकार बुखार की दवा दे कर यह उम्मीद कर रही है कि वह ठीक हो कर फिर से दौड़ने लगेगी।

उनके मुताबिक इस तरह की हवाई घोषणाओं से न तो उद्योग जगत को कोई लाभ होगा और न ही अर्थव्यवस्था की हालत में सुधार होगा। उनके मुताबिक संकट की इस घड़ी में उद्यमियों को सीधी सरकारी मदद की जरूरत थी। जिससे वह अपने कर्मचारियों को वेतन का भुगतान करने के साथ ही अपना कामकाज दुबारा से शुरू कर सकें। उन्होंने कहा कि उद्यमियों के पास इस समय अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर लोगों के बेरोजगार हो जाने की आशंका है।उनके इस सुर में सुर मिलाते हुए एडवोकेट और टैक्स कंसल्टेंट मुकेश गोयल कहते हैं कि यह केवल शब्दों और आंकड़ों की बाजीगरी है। इससे न तो उद्योग जगत को कोई लाभ होगा और न ही पटरी से उतर चुकी अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर लौट पाएगी।

उनका कहना है कि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह ऐलान तो कर दिया कि सूक्ष्म,लघु और मध्यम दर्जे के उद्यमियों को बैंकों से तीन लाख करोड़ रुपए का कर्जा दिया जाएगा और सरकार इसकी गारंटी लेगी। मगर बैंकों की अपनी व्यवस्था है। वह उद्यमी के कर्ज की रकम चुकाने की क्षमता और उसके पिछले रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए ही फैसला करते हैं। उनके लिए वित्तमंत्री की ओर से की गई मौखिक घोषणा कोई मायने नहीं रखती है। उनका यह भी कहना है कि बाजार में मांग बिल्कुल नहीं है और न ही मध्यम वर्ग के पास खरीदने की क्षमता बची है। ऐसी स्थिति में यदि उद्यमी जोड़ तोड़ करके बैंक से ऋण ले भी लेता है तो फिर उसे चुकाएगा कैसे। उनका कहना है कि यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो यह ऐसा ही जैसे मैं अपने खातों में यह दिखा दूं कि मैंने इतने पैसे आप को दे दिए हैं। जबकि वह पैसा आपके पास पहुंचा ही नहीं।

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए ओखला औद्योगिक क्षेत्र के उद्यमी राम सेवक शर्मा कहते हैं कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की इन घोषणाओं से उद्यमियों को कोई राहत नहीं मिलेगी। अगर सरकार वास्तव में उद्यमियों को बचाना चाहती है तो उसे उन्हें कर्मचारियों के कम से कम दो महीने के वेतन की राशि अनुदान के रूप में मुहैया कराने की व्यवस्था करनी चाहिए थी। एक अन्य कारोबारी रविन्द्र कुमार का कहना है कि बैंकों का कर्ज तो हर हालत में उद्यमी को ब्याज समेत चुकाना ही पड़ेगा। वरना बैंक अपना पैसा वसूलने के लिए उसके खिलाफ कार्रवाई करेगा। उनके मुताबिक वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की इस घोषणा का अगर सबसे ज्यादा फायदा किसी को होगा तो वह बैंकों के अधिकारियों और राजनेताओं के खास सिपहसालारों को होगा। क्योंकि वह उद्यमियों को कर्ज दिलाने के नाम पर अपनी जेबें भर लेंगे।

आल इंडिया फ़ोरम टैक्स एडवोकेट फोरम के चैयरमैन एम के गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से सूक्ष्म,लघु और मध्यम आकार के उद्यमियों को राहत देने वाले पैकेज का स्वागत करते हुए कहा कि इससे उद्योग जगत को निश्चित तौर पर लाभ होगा। मगर बैंकों को इस बात का भी पूरा ध्यान रखना होगा कि कर्ज सही लोगों को दिया जाए। वरना यह पैसा डूब सकता है। जिसकी वजह से सरकार को इसे बट्टे खाते में डालना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को इस बात पर भी नजर रखनी होगी कि कहीं बिना जमानत के दिए जाने वाले कर्जों की राशि की आपस में बंदरबांट न हो जाए।

वहीं एक अन्य कारोबारी ने सरकार की ओर से घोषित किए गए पैकेज का स्वागत करते हुए कहा कि इससे यह अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दोनों ही भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को उद्यमियों को बैंकों से ऋण दिलाने के बजाय व्यापारियों को आपस में नगदी का लेन-देन करने की छूट देने पर विचार करना चाहिए। सरकार को उद्यमियों पर भरोसा करने के साथ ही उन्हें पैसे का लेन-देन करने की पूरी आजादी दे देनी चाहिए और इस संबंध में आयकर विभाग की ओर से लगाई गई पाबंदियां को खत्म कर देना चाहिए। ताकि उद्यमी खुलकर व्यापार करने के साथ ही अर्थव्यवस्था को सुधारने में अपना योगदान दे सकें। उन्होंने कहा कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर सही तरीके से ध्यान देने से ही सरकार को कर के रूप में मिलने वाले राजस्व की सारी राशि मिल जाएगी। व्यापार में धन का प्रवाह होने से अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

आलोक गौड़

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