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कब तक सामना कर पाएंगे भूख और बदतर होते हालात का
कब तक सामना कर पाएंगे भूख और बदतर होते हालात का
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कब तक सामना कर पाएंगे भूख और बदतर होते हालात का

लाखों बच्चे हो रहे हैं भुखमरी का शिकार

व्यवस्था का हिस्सा न होने के कारण कहीं से भी नहीं मिल रही है मदद।देखना यह है कि कब तक सामना कर पाएंगे भूख और हर दिन बदतर होते हालात का।कड़वी हकीकत से रूबरू कराने वाली नेशनल थाट्स की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट।

कोरोना वायरस से निपटने के लिए लागू किए गए देशव्यापी लाक डाउन का असर वैसे तो हर नागरिक पर पड़ा है। संकट की इस घड़ी में जरुरतमंदों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार से लेकर सामाजिक संगठन व संस्थाओं की ओर से तमाम तरह के उपाय किए जा रहे हैं।

लेकिन देश के करोड़ों मासूम बच्चे लाक डाउन के कारण भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। दुःख की बात तो यह है कि इन बच्चों तक न तो किसी प्रकार की सरकारी सहायता पहुंच पा रही है और न ग़ैर सरकारी संगठनों की ओर से ही कोई मदद मिल रही है।

जिसकी वजह से यह बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे हैं।

अगर समय रहते इन तक मदद नहीं पहुंची तो पता नहीं इनमें से कितने बच्चे जीवित रह पाएंगे

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में 47.2 करोड़ बच्चे हैं। बच्चों की यह संख्या पूरे विश्व में सबसे ज्यादा है। इनमें से चार करोड़ ऐसे बच्चे हैं जो गरीब तबके से ताल्लुक रखते हैं और जिन्हें अपना पेट भरने के लिए खुद मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है।

इतना ही नहीं इन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण भी करना पड़ता है

यह बच्चे खेतों में काम करने से लेकर महानगरों और शहरों में कूड़ा बीनने, छोटे ढाबों वह चाय की दुकान पर झूठे बर्तन मांजने। जूते पॉलिश करने और चौराहे पर भीख मांगने जैसे काम करते हैं।

इनमें से ज्यादातर बच्चे रहने का ठिकाना न होने की वजह से फ्लाईओवरों के नीचे या फुटपाथ पर रात बिताते हैं। लाक डाउन की वजह से इनका कामकाज पूरी तरह बंद हो गया है। इसके साथ ही रहने का आसरा भी छिन गया है।

दिल्ली सरकार के बाल एवं महिला कल्याण विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक फ्लाईओवर और फुटपाथों से खदेड़ दिए गए लावारिस वह बेसहारा बच्चे रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म के साथ ही शहर की अंधेरी तंग गलियों में रात गुजार रहे हैं।

उनका यह भी कहना है कि यह बच्चे किसी भी प्रकार की व्यवस्था का हिस्सा नहीं है।

किस  वजह से इन तक सरकारी मदद नहीं पहुंच पा रही है
प्राप्त जानकारी के मुताबिक लाक डाउन के दौरान लगभग ढाई से तीन लाख तक बच्चे विभिन्न संगठनों व संस्थाओं की हेल्पलाइन नंबर पर फोन करके मदद की गुहार लगा रहे हैं। मगर उनके लिए भी इतनी बड़ी संख्या में बच्चों तक सहायता पहुंचाना संभव नहीं है।
लाक डाउन में रेल,बस से लेकर परिवहन के सभी साधन बंद कर दिए जाने से यह बच्चे दिल्ली छोड़ कर अपने घर या फिर किसी रिश्तेदार के यहां भी नहीं जा पा रहे हैं।

ऐसे कुछ बच्चों का कहना है कि यह तो पता नहीं कि कोरोना वायरस उनकी जान लेगा या नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि पेट की भूख और इसके कारण होने वाली बीमारियां उन्हें जिंदा नहीं रहने देंगी।

आलोक गौड़

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