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भाई-बहन के प्यार और सम्मान का प्रतीक है रक्षा बंधन

हमारे देश में कई तरह के त्यौहार मनाए जाते है। जिनके अलग-अलग महत्व होते है। कोई त्यौहर किसी विशेष दिन को समर्पित होता है तो कोई त्यौहार भारतीय संस्कृति को। भाई-बहन के अगाढ़ प्रेम को दर्शाने वाला एक त्यौहार रक्षाबंधन के नाम से जाना जाता है। रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है बदले में भाई बहन की रक्षा करने का प्रण लेता है। इस तरह भाई-बहन का यह रिश्ता कच्ची डोरियों से मजबूती के साथ जुड़ जाता है। इसके अलावा  रक्षाबंधन पारिवारिक समागम और मेल-मिलाप बढ़ाने वाला त्यौहार है । इस अवसर पर परिवार के सभी सदस्य इकट्‌ठे होते हैं । विवाहित बहनें मायके वालों से मिल-जुल आती हैं । उनके मन में बचपन की यादें सजीव हो जाती हैं। बहन भाई की कलाई में राखी बाँधकर उससे अपनी रक्षा का वचन लेती है । भाई इस वचन का पालन करता है । इस तरह पारिवारिक संबंधों में प्रगाढ़ता आती है । लोग पिछली कड़वाहटों को भूलकर आपसी प्रेम को महत्त्व देने लगते हैं ।

रक्षा बंधन की कैसे हुई शुरूआत 

माना जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने जब शिशुपाल का वध किया था तब उनकी अंगुली में चोट लग गई थी। उस चोट को देख द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक हिस्सा फाड़कर उनकी चोट पर बांध दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने भी द्रौपदी से हर संकट की परिस्थिति में उनकी रक्षा करने का वादा किया और उन्हें अपने बहन बना लिया। जिस दिन यह सब हुआ था, उस दिन श्रवणमास की पूर्णिमा थी। तभी से इसी दिन रक्षाबंधन मनाया जाता है और सभी बहनें ‘द्रौपदी’ की ही तरह अपने भाइयों को रक्षासूत्र बांधती हैं और भाई भी ‘श्रीकृष्ण’ की तरह ही बहनों की रक्षा का वचन देते हैं।

एक अन्य पौराणिक महत्व के अनुसार श्रावण मास में ऋषिगण आश्रम में रहकर अध्ययन और यज्ञ करते थे । श्रावण-पूर्णिमा को मासिक यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी । यज्ञ की समाप्ति पर यजमानों और शिष्यों को रक्षा-सूत्र बाँधने की प्रथा थी । इसलिए इसका नाम रक्षा-बंधन प्रचलित हुआ । इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए ब्राह्मण आज भी अपने यजमानों को रक्षा-सूत्र बाँधते हैं । बाद में इसी रक्षा-सूत्र को राखी कहा जाने लगा । कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते हुए ब्राह्मण निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं-

येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल: ।
तेन त्वां प्रति बच्चामि, रक्षे! मा चल, मा चल ।।

अर्थात् रक्षा के जिस साधन (राखी) से अतिबली राक्षसराज बली को बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ । हे रक्षासूत्र! तू भी अपने कर्त्तव्यपथ से न डिगना अर्थात् इसकी सब प्रकार से रक्षा करना ।

रक्षा बंंधन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1526 ईसवी में जब बाबर ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया, तब राणा संग्राम सिंह उर्फ़ राणा सांगा ने इस विदेशी आक्रान्ता के खिलाफ राजपूत राजाओं को एकत्रित किया और बाबर पर धावा बोला । लेकिन 1527 में खानुआ की लड़ाई में, यह संयुक्त हिंदू शक्ति बाबर के तोपखाने से पराजित हो गई |  बाबर के बाद उनका बेटा हुमायूँ ने सत्ता की डोर संभाली। हुमायूं ने सांगा की पत्नी को अपनी बहन बनाकर पूरे भारत के इतिहास में ऐसी मिसाल कायम की जिसे हिन्दू-मुस्लिम की महजबी एकता की मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है।

गुजरात के शासक बहादुर शाह ने जब मेवाड़ पर हमला किया तब राणा सांगा के बाद सिसौदिया वंश के अन्य परिजन अल्पवयस्क के कारण युद्ध के लिए तैयार नहीं थे |  कर्णावती ने तत्कालीन मुग़ल सम्राट हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी। जब तक हुमायूं कर्णावती की रक्षा के लिए पहुँचते तब तक बहुत देर हो गई थी। मार्च, 1535 को रानी कर्णावती 13000 स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गई थी। इसके बाद हुमायूं और बहादुर शाह  के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध  में बहादुर शाह को हुमायूं ने परास्त कर दिया और राखी की लाज रखते हुए हुमायूँ ने पूरा राज्य कर्णावती के बेटे विक्रमजीत सिंह को सौंप दिया।

कब और कैसे मनाया जाता है रक्षा बंधन 

हिन्दू पंचाग के अनुसार, रक्षा बंधन का पर्व श्रावण मास ( सावन के महीने) में आता है। यह श्रावण मास के आखिरी दिन मनाया जाता है जो कि अगस्त के महीने में आता है। सावन का पूरा महीना ही हिंदू धर्म के अनुसार काफी शुभ माना जाता है। रक्षा बंधन दिन के समय मनाया जाता है, इस पवित्र दिन को मनाने के लिए  भाई बहन मनमोहक वेशभूषा धारण करते है। बहनों द्वारा भाइयों के माथे पर तिलक लगाया जाता है तथा उनके कलाई पर राखी बांधी जाती है और उन्हे मिठाई खिलाई जाती है। इन सब कार्यो को करते हुए बहनों द्वारा अपने भाइयों के मंगल की कामना की जाती है। इसके बाद भाइयों द्वारा अपने बहनों को उपहार प्रदान किया जाता है और हर हाल में उनके रक्षा करने का संकल्प लिया जाता है। राखी बांधने तक भाइयों और बहनों द्वारा उपवास रखा जाता है और राखी बांधने के पश्चात ही वह कुछ खाते है।

श्रावण पूर्णिमा के दिन मंदिरों में विशेष पूजा- अर्चना की जाती है । लोग गंगाजल लेकर मीलों चलते हुए शिवजी को जल चढ़ाने आते हैं।  काँधे पर काँवर लेकर चलने का दृश्य बड़ा ही अनुपम होता है । इस यात्रा में बहुत आनंद आता है । कई तीर्थस्थलों पर श्रावणी मेला लगता है । घर में पूजा-पाठ और हवन के कार्यक्रम होते हैं । रक्षाबंधन के दिन दान का विशेष महत्त्व माना गया है । इससे प्रभूत पुण्य की प्राप्ति होती है, ऐसा कहा जाता है । लोग कंगलों को खाना खिलाते हैं तथा उन्हें नए वस्त्र देते हैं । पंडित पुराहितों को भोजन कराया जाता है तथा दान-दक्षिणा दी जाती है ।

भाई-बहन के आगाढ़ प्रेम को दर्शाता यह त्यौहार आज लगभग हर धर्म के लोग मनाते है। मुस्लिम भाई भी हिंदु बहनों से राखी बंधवाकर उसकी रक्षा का वचन लेते है। भारत के अलावा यह त्यौहार मॉरीशस और नेपाल में भी मनाया जाता है। यह पर्व भाई के बहन के पवित्र रिश्ते को दर्शाता है, रक्षा बंधन का पर्व प्रचीन काल से ही मनाया जा रहा है। इस पर्व से जुड़ी हुई कई सारी पौराणिक और ऐतिहासिक  कहानियां है, जिनका अपना महत्व है। इस त्यौहार पर बाज़ारों में खासा रौनक देखी जाती है। बहुत तरह की राखियों के प्रकार से बाजार में जगमगाहट देखी जाती है।  इस त्योहार की पूरे वर्ष प्रतीक्षा की जाती है तथा इसे बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है।

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