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Religious Special: - The glory or importance of Shrimad Bhagwat Maha Purana
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Religious Special :- श्रीमद्भागवत महापुराण की महिमा अथवा महत्व ( भाग -2 )

यः पठेत प्रयतो नित्यं श्लोक भागवतं सुत |

 अष्टादशपुराणानां  फलमाप्नोति   मानव: ||

जो प्रतिदिन पवित्रचित्त होकर भागवत के एक श्लोक का पाठ करता है, वह मनुष्य अठारह पुराणोंके पाठ का फल प्राप्त करता है कलियुग में जहाँ-जहाँ पवित्र भाग्वातशास्त्र रहता है वहां-वहां मैं इस प्रकार रहता हूँ, जैसे पुत्रवत्सला गाय अपने बछड़े के पीछे-पीछे जाती है-

                                   यत्र यत्र भवेत् पुण्यं शास्त्रं भागवतं कलौ |

                                   तत्र तत्र  सदैवाहं  भवामि   त्रिदशैः  सह ||

                                   यत्र यत्र    चतुर्वक्त्र  श्रीमद्भागवतं भवेत् |

                                   गच्छामि तत्र  तत्राहं  गौर्यथा सुतवत्सला ||

सूतजी ने शौनकजीको भागवत की महिमा बताते हुए कहा है –

                               एतस्माद्परं  किञ्चिन्मनःशुध्यै न विद्यते |

                               जन्मान्तरे भवेत्पुण्यं तदा भागवतं लभेत ||

 

भागवत कथा से संबद्ध तीन संवाद है- (१) सूतजी-शौनकजीका, (२) सनकादि-नारदका, (३) शुकदेव-परीक्षितका | इनमे प्रमुख संवाद शुकदेव-परीक्षितका ह भागवत-महात्म्य मे शौनकजी सूतजी से पूछते है कि भक्ति, ज्ञान, वैराग्यकी प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइये | कोई ऐसा साधन बताइये, जिससे इस कलिकाल के पापों से मुक्त होकर व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त कर सके | तब सूतजी ने कहा कि मनुष्य को समस्त पापों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करने वाला शास्त्र भागवत-पुराण है | सूतजी ने शौनकजी से इसकी महिमा का बखान किया और कहा कि अब मैं आपको वह कथा सुनाता हूँ, जो सनकादिक ऋषियों ने नारदजी को सुनाई थी |

श्रीमद्भागवत-महात्म्य के प्रसंगमे भक्ति के कष्ट-निवारणकी कथा**
एक बार चारो ऋषि (सनकादिक) विशालपुरी में पधारे हुए थे, वहां उन्होंने नारदजी को देखा | नारदजी का मुख म्लान और उदास था | मुनियोंने उनसे इसका कारण पूछा | नारदजी बोले – मैं सर्वोत्तम लोक समझकर पृथ्वी लोक पर गया, पर वहां पर मुझे बड़ी अद्भुत स्थिति देखने को मिली | मैं सारे तीर्थो में घुमा पर कहीं भी मुझे शांति नहीं मिली | वहां चारो और अधर्म का बोलबाला है, जीव केवल अपना ही पेट पलने में लगे हुए है |  वे असत्य भाषी और आलसी हो गए है | स्त्री-पुरुषों में केवल कलह मचा रहता है | पृथ्वी पर विचरता हुआ मैं यमुना-तट पर पंहुचा तो वहां मैंने देखा कि एक युवती स्त्री दु:खी मन से बैठी है, उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेतावस्था में पड़े है, जिन्हें बार-बार होशमें लाने का प्रयत्न कर रही है, पर उन्हें होश नहीं आरहा है |

मुझे देख कर वह तरुण स्त्री खड़ी हो गयी और प्रार्थना करने लगी मेरे इन पुत्रो को होश में ला दिजिये, मैं बहुत दुखी हूँ नारदजी के पूछने पर उसने बताया कि मैं भक्ति हूँ, ये दोनों मेरे बेटे ज्ञान और वैराग्य हैं | मैं (भक्ति) द्रविड़ देशमे जन्मी, कर्णाटक में बड़ी, कहीं-कहीं महाराष्टमें सम्मानित हुई, पर गुजरात में मुझे बुढ़ापेने आ घेरा | अब जब से वृन्दावन आयी हूँ, तबसे सुंदरी रूपवती युवती हो गयी हूँ, किन्तु मेरे पुत्र उसी अवस्था में हैं | आप कुछ उपाय कीजिये, जिससे ये स्वस्थ, चेतन और तरुण हो जाएँ | नारदजी ने उन दोनों को वेदध्वनी, वेदांतघोष और बार-बार गीता पाठ करके जगाया, इससे उनमे थोड़ी सी चेतनता आयी; किन्तु वे फिर निस्तेज होकर गिर पड़े | इस पर नारदजी बड़े चिंतित हुए कि अब क्या किया जाय | इसी समय आकाशवाणी हुई कि तुम सत्कर्म करो, पर इसका आशय नारदजी को समझमें नहीं आया | नारदजी वहां से चल दिए और मार्ग में मिलने वाले मुनीश्वरो से वह साधन पूछने लगे, पर किसी से कुछ बताते नहीं बना |

तब नारदजी बदरीवन आये और तप करने का विचार करने लगे, इतनेमेंही सामने उन्हें सनकादिक ऋषि दिखाई दिए | नारदजी ने कहा-मुनिवरो ! बड़े भाग्य से आपका समागम हुआ है | नारदजी ने उन्हें अपनी समस्या बतायी | सनकादिक ने कहा आप चिंता न करें | भागवत-महापुराण सुनने से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बल मिलेगा | इसके साथ नारदजी के साथ सनकादिक भी श्रीमद्भागवत-कथामृत का पान करने गंगा तट पर आये | भागवत कथा का समाचार पाकर सभी ऋषि-मुनि दौड़-दौड़कर वहां आ पहुंचे | इसके अतिरिक्त वेद, वेदांत(उपनिषद), सभी पुराण एवं छहों शास्त्र भी मूर्तिमान होकर वहां उपस्थित हुए |

सनकादिक नारदजी के दिए हुए आसन पर विराजमान हुए और भागवत-कथा का महात्म्य सुनाने लगे | वे बोले- नारदजी ! भागवत-कथा के श्रावण मात्र से मुक्ति हाथ लगती है | भागवत में अठारह हज़ार श्लोक है और यह शुकदेव-परीक्षित का संवाद है जिस घर में नित्यप्रति भागवत कथा होती है, वह घर तीर्थरूप होजाता है जो लोग उसमे रहते है, उनके सारे पाप नष्ट होजाते है | जो मनुष्य अंत समय में भी भागवत सुन लेता है, उसे प्रभु वैकुण्ठ धाम दे देते है | जब करोड़ो जन्मो के पुण्य उदय होते है तभी भागवत की प्राप्ति होती है-

‘कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते ||’
भागवत की महत्ता सुनकर शौनकजी ने पूछा-सूतजी ! भागवत मोक्ष की प्राप्ति में सभी साधनों से कैसे आगे बढ़ गया ? तब सूतजी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण जब अपने स्वधाम को पधारने लगे तो उद्धव ने उनसे कहा कि आप तो जारहे हैं, अब इस घोर कलियुग में साधु, संत, सज्जनों की रक्षा कौन करेगा और उनके जीवन का सहारा क्या होगा ? इसलिए आप उनके हितमें यहाँ से न जाइये | इसपर भगवान सोचने लगे कि भक्तो के अवलम्बन के लिए मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिए | तब भगवान ने अपनी साडी शक्ति श्रीमद्भागवत में रख दी और वे अंतर्ध्यान होकर इस भागवत समुद्रमें प्रवेश कर गये-

स्वकीयम् यद्भवेत्तेजस्तच्च भग्वतेअधात |

 तिरोधाय   प्रविष्टोयं श्रीमद्भागवतार्पणम् ||

इसलिये ये भागवत भगवान की साक्षात शब्दमयी मूर्ति है, यह भगवान क वङ्मयस्वरूप् है | इसके पठन, श्रवण, दर्शन से मनुष्य का मन निर्मल होजाता है ओर उसमे भक्ति का उदय होता है, जो सब प्रकार से मनुष्य का कल्याण करती है | फिर सूतजी बोले-शौनकजी ! जिस समय सनकादिक मुनीश्वर ग्रन्थ-महिमा बता रहे थे, तब उस सभा में एक बड़ा आश्चर्य घटित हुआ | वहां तरुणावस्था को प्राप्त हुए दोनों पुत्रो के साथ विशुद्ध प्रेमस्वरूपा भक्ति भगवन्नामो का उच्चारण करती हुई प्रकट हो गयी सनकादिक ने कहा कि ये भक्ति देवी कथा के प्रभाव से ही यहाँ प्रकट हुई हैं | भक्ति देवी सनकादिक से बोली- अपने कथा सुनाकर मुझे फिर पुष्ट कर दिया है, अब मैं कहाँ रहूँ ? तब मुनिश्वरोंने कहा- ‘देवी!तुम भक्तो के ह्रदय में निवास करो |’ यह सुनकर भक्ति तुरंत भक्तो के ह्रदय में जा विराजीं | भक्ति के वश होकर भगवान भी भक्तो के पास खिंचे चले आते हैं | भक्ति प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन भागवत-कथामृत का पान करना है | कलियुग में यह सर्वोत्तम साधन है |

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