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Religious Special: - The glory or importance of Shrimad Bhagwat Maha Purana
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Religious Special :- श्रीमद्भागवत महापुराण की महिमा अथवा महत्व ( भाग -3 )

सूतजी ने कहा कि कथा के समय भक्ति का प्रादुर्भाव हुआ देख भगवान श्रीकृष्ण भी अपने आलौकिक अलंकरण धारण किये हुए परमसुन्दर रूपमे अपने धाम को छोड़ वहां पधारे | भक्तों ने उनके दर्शन कर उनकी रूपमाधुरी का अपलक नेत्रोंसे पान किया | देखतेहीदेखते वे मुरलीमनोहर सब भक्तोंके ह्रदय में विराज गये | सभीको देहगेहकी सुधि भूल गयी और एक अनिवर्चनीय आनन्द के सिन्धुमें वे सब डूब गये | ऐसा अद्भुत आनन्द रस बरसता है भागवतके सप्ताहपरायण महायज्ञमें | सनकादिक ऋषि ने कहा कि इस कथा के श्रवणसे मनुष्य बड़ेसेबड़े पापोंसे मुक्त हो पूर्णतः पवित्र हो जाते हैं | इस प्रसंग से दो महत्त्वपूर्ण तथ्य उजागर होते हैंएक तो यह कि तरुणावस्था में ही जो तरुण उत्साहहीन, उमंगहीन हो वृध्दोंजैसे दिखने लगते है और जीवनमें हताशानिराशाके जालमें फँस जाते हैं, उन्हें केवल शास्त्रोंके ओजस्वी वचन सुनाकर ही जगाया जा सकता है | शास्त्र ही उनमें तरुणाईका पुनः संचार कर सकते हैं | इसलिए तरुणों एवं युवकोंको अध्यात्मिक ग्रन्थोंका स्वाध्याय करना चाहिए | दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भगवानका सान्निध्य, उनका अनुग्रह भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है | भक्तिसे भगवान भक्तके ह्रदयमे आ विराजते हैं |

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गोकर्णका आख्यान

भागवत के महत्म्यको प्रतिपादित करनेहेतु सूतजी एक अन्य प्रसंग सुनाते हुए कहते हैं कि पूर्वकालमें तुंगभद्रा नदी के तटपर एक सुन्दर नगर बसा हुआ था, उस नगर में आत्मदेव नामके एक ब्राह्मण थे, उनकी पत्नी धुन्धुली कुलीन एवं सुंदरी होने पर भी जिद्दी स्वभावकी थी | वह स्वाभाव से क्रूर, बकवाद करनेवाली और झगड़ालू थी | ब्राह्मण दम्पत्ति सब प्रकार से संम्पन्न थे, पर उनके कोई संतान नहीं थी | जब उम्र अधिक हो गयी तो उन्होंने संतानप्राप्तिहेतु कई प्रकार के दानयज्ञ किये, पर संतान नहीं हुई |

एक दिन दु:खी होकर वह ब्राह्मण वनको चल दियाचलतेचलते उसे प्यास लगी तो एक तालाब के किनारे गया और जल पीकर वहीँ बैठ गया | दो घड़ी बीतने पर वहां एक सन्यासी आये | जब उन्होंने जल पी लिया तो ब्राह्मण उनके पास गया और अपनी व्यथा सुनायी | सन्यासी ने कहा कि ब्राह्मणदेव ! मायामोह छोड़ दो, कर्मकी गति गहन है– ‘गहना कर्मणो गतिः’ (गीता ४/१७)| सात जन्मतक तुम्हारे कोई संतान किसी प्रकार नहीं हो सकती | जब ब्राह्मण नहीं माना और प्राण त्यागनेको तैयार हुआ तो सन्यासीने एक फल देकर कहा कि यह फल अपनी पत्नीको खिला देना, इससे उसको पुत्र उत्पन्न होगा |

ब्राह्मण फल लेकर घर आया और सारा वृत्तान्त बताकर पत्नी (धुन्धुली)-को फल दे दिया | पत्नी कुतर्की स्वाभाव की तो थी ही,उसने सोचा गर्भधारणकी परेशानियों एवं प्रसवके पचड़ेमें कौन पड़े, इसलिए उसने वह फल नहीं खाया और अपनी गाय को खिला दिया | पति से झूट बोल दिया की उसने फल खा लिया है और गर्भवती होने नाटक करने लगी | दैवयोग से उसीकाल में उसकी बहन के भी बच्चा होने वाला था उसने बहन से मंत्रणा करके वह पुत्र अपने घर बुलवा लिया और स्वयं का पुत्र बता दिया और बहन को यह कहकर रख लिया कि मेरे स्तन में दूध नहीं है और इसका बच्चा मर गया है, यह मेरे बच्चे को पाल देगी | धुन्धुलीने ने पुत्र का नाम धुन्धुकारी रखा | आत्मदेव बड़ा प्रसन्न हुआ | तीन महीने के अन्तराल से उस गायने भी एक सुन्दर कन्तिवाले बालक को जन्म दिया | उसे देखकर ब्राहमण बड़ा प्रसन्न हुआ | बालक के कान गौ के कानजैसे थे, अतः आत्मदेव ने उसका नाम गौकर्ण रखा |

काल बीतने पर दोनों बालक जवान हो गए | उनमें गौकर्ण तो पंडित और ज्ञानी हुआ और धुन्धुकारी बड़ा ही राक्षस प्रवृत्ति का हुआ, धुन्धुकारी बड़ा दुष्ट,और क्रूर था | वह चोरी और हत्याएँ करता और दीनदुखियोंको तंग करता था | वेश्याओं के जाल में फंसकर उसने माँबाप की सारी संम्पत्ति नष्ट कर दी | एक दिन मातापिता को मारपीटकर, वह घर के बर्तनभांड़े भी उठा ले गया |

इस प्रकार संपत्ति स्वाह होते देख और कुपुत्र के कष्टों से आत्मदेव फूटफूट कर रोने लगा और कहने लगा कि इससे तो संतानहीन ही अच्छा था | हाय ! अब मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊं ? इस तरह ब्राहमण विलाप कर ही रहा था कि उसी समय परम ज्ञानी गौकर्ण वहाँ आ पहुँचे | उन्होंने पिता को वैराग्यका उपदेश देते हुए बहुत प्रकार से समझाया | पिताजी ! यह संसार असार है, स्त्रीपुत्र के मोहमाया में न फँसिये |यह शरीर भी अपना नहीं है, यह तो कालका ग्रास है | मोहममता को छोड़कर वन को जाइये और भगवान में मन लगाइये | आत्मदेव गौकर्ण का कहना मानकर वन को चलेगये  और वहाँ भगवतभजनकर भगवान के धाम को पधारे |

यहाँ धुन्धुकारी रुपयेपैसों के लिये माँ को मरने पीटने लगा | तंग आकर माँ ने एक दिन कुँए में गिर कर जान दे दी |धुन्धुकारी पाँच वेश्याओं को ले आया और अपने घर में रखा | उनकी इच्छाओं की पूर्ति के लिये वह चोरीकर धन लाने लगा | वेश्याओं ने सोचा कि इसकी चोरीकी वजह से किसी दिन हम पकड़ी न जाये, इसलिए उन पांचो ने मिलकर धुन्धुकारी की हत्या कर दी | यहाँ कथा का सुन्दर संकेत यह है कि ये पाँच वेश्याएँ हमारी इन्द्रियाँ हैं और उन्ही की इच्छापूर्ति, तृप्ति एवं तुष्टि के लिए मनुष्य नाना प्रकार के पाप, दुष्कर्म करता है और ये ही एक दिन उसके अंत का कारण बनती है, इन्हीं के जाल में फंसकर वह अपना अंत स्वयं करता है | धुन्धुकारी अपने इन्हीं कर्मो के कारण भयंकर प्रेत बना  वह बवंडर की तरह चारो तरफ भटकता फिरता था तथा भूखप्यास से व्याकुल हो चिल्लाता रहता था | गौकर्ण तीर्थयात्रा पर गये हुए थे | वहाँ उन्होंने लोगोंके मुँह से धुन्धुकारी की मृत्यु का समाचार सुना तो गयामे जाकर उन्होंने भाई का विधिवत श्राद्ध किया | कुछ समय बाद गौकर्ण अपने नगर लौटे रात्रि का समय था, अतः वे सीधे अपने घर गये | रात्रि में गौकर्ण को सोया देख प्रेतरूपी धुन्धुकारी अपनी व्यथा सुनायी और कहा कि मैं तुम्हारा भाई अपने पापकर्मो के कारण प्रेतयोनि में पड़ा हूँ,मुझे इससे मुक्ति दिला दीजिये |

धुन्धुकारी की मुक्ति के लिये गौकर्ण ने भागवतसप्ताहरूपी ज्ञानयज्ञका आयोजन किया और स्वयं भागवतकथा का प्रारम्भ किया | बड़ी संख्या में श्रोता आये | प्रेतयोनि वाला धुन्धुकारी भी पवन रूप में आया | अपने लिए कोई स्थान न देखकर वहाँ स्थित सात गांठों वाले बांसकी पोरमें घुस गया और कथा सुनने लगा | कथा समाप्ति पर प्रतिदिन एक घटना घटती | रोज़ बांस की एक पोर चटक जाती थी | अंतिम दिवस आखिरी गांठ भी चटक गयी और धुन्धुकारी प्रेतयोनि से छुटकारा पा दिव्य रूप में प्रकट हुआ | बांस की ये सात गांठें मनुष्यकी वासनाओंकाम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और अहं (अहंकार)-की प्रतीक हैं | इनके हटते ही व्यक्ति अपने दिव्य स्वरुप में आ जाता है उसी समय वैकुंठसे पार्षदों सहित एक विमान उतरा और धुन्धुकारी को उसमे बिठाकर ले गये सभी ने दृश्य बड़े विस्मय से देखा | यह भागवतकथा को श्रद्धा मननपूर्वक सुनने का परिणाम था | जैसे आगमें तपकर सोना कंचन बनता है, वैसे ही पश्चातापकी आगमें तपकर पापी भी पुण्यात्मा बन जाता है और फिर भक्ति एवं सत्संग के माध्यम से मुक्ति प्राप्त करता है |

इसके बाद श्रावण मास में गौकर्ण ने पुनः कथा कही | उसकी समाप्ति वहाँ बहुतसे विमान आये और गौकर्ण सहित सभी श्रोतओंको वैकुंठ ले गये |

आत्मदेवधुन्धुलीधुन्धुकारीगौकर्ण के इस सम्पूर्ण आख्यान से व्यासजी हमें यह संकेत दे रहे हैं कि संसार में आकर मनुष्य को भगवदभजन करते हुए सत्कर्म करने चाहिए | ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य पूर्ण करना चाहिए और भगवान जिस हाल में रखें, उसी में प्रसन्न रहना चाहिए |

अतएव भागवतकथा व्यक्ति को अपने सांसारिक कर्तव्यों एवं दायित्वोंका निर्वाह करते हुए आत्मोत्थानपर चिंतन करने हेतु प्रेरित करती है और यह चिंतनमनन उसे मोक्षपथ पर ले जाकर परमात्मा से साक्षात्कार कराता है |

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