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Role of mind in body (Part-2)
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शरीर में मन की भूमिका ( भाग -2)

शरीर में प्राणमय कोष पाँच नामों वाला हो जाता है। कण्ठ में रहने वाला प्राण ” उदान ” कहलाता है जिसका कार्य वाणी है। कण्ठ और नाभि के बीच स्थिर रहने वाला प्राण ” प्राण ” कहा जाता है। जिसका कार्य श्वांस खीचना और छोड़ना है । नाभि और गुदा के मध्य रहने वाला प्राण ” अपान ” कहलाता है। जिसका कार्य मल – मूत्र को त्याग है। नाभि में रहने वाला प्राण ” समान ” कहलाता है। जिसका कार्य प्राण और अपान में संतुलन रखना है। सम्पूर्ण देह में व्याप्त प्राण ” व्यान ” कहलाता है जिसका कार्य रक्त संचालन है । शरीर इसी प्राण शक्ति के कारण संचालित रहता है। आत्मा इसी की सहायता से काम करता है। ”

शरीर में मन की भूमिका ” यह जानने से पूर्व यह सब बताना आवश्यक था। और कई बातें जानना भी आवश्यक है तभी हम शरीर में मन की भूमिका समझ सकेंगे। इन तथ्यों को भी समझें। इन सबके अलावा आत्मा की एक सोई हुई शक्ति का अतुल्य भंडार भी है। जो ” कुण्डलिनी शक्ति ” कहलाती है। ये एक रिज़र्व कोष है जो सुप्त रहता है। विधि विशेष से आवश्यक होने पर साधनाओं द्वारा इसे जागृत कर इस शक्ति का प्रयोग किया जाता है। जिससे मनुष्य की क्षमताएं बढ़ जाती हैं। वो मानव से अतिमानव हो जाता है। किंतु दीखता साधारण ही है।

इसके बाद संक्षिप्त में कहूँ .. कारण शरीर — जिसमें आत्मा निवास करती है ।जिसमें मन , बुद्धि , चित्त और अहंकार युक्त होता है। सूक्ष्म शरीर — 5 कर्मेन्द्रियाँ , 5 ज्ञानेंद्री , पांच प्राण , पांच भूत , अविद्या , काम , कर्म मिलकर सूक्ष्म शरीर बनता है। ये वासना से युक्त हो कर्मों का कर्ता व् भोक्ता बनता है । ये आत्मा का ही स्वरूप वासना से युक्त हो स्वयं को आत्मा से पृथक मानने लगता है । यह उस पूर्ण परमात्मा के सारे व्यापार को चलाता है । ये सभी घटक उपर्युक्त तरीके से ये सारी व्यवस्था चलाते हैं । इन सबका स्थूल रूप ये हमारा ” स्थूल शरीर ” है । अब मन पर आते हैं ।

मन का स्वरूप ——————— मन केवल आत्म चेतना की अभिव्यक्ति है । जब चेतन शक्ति और जड़ शक्ति का मिलन होता है , तो उससे मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार आदि की क्रमशः उतपत्ति होती है। सबसे पहले ” मैं हूँ ” अर्थात अहंकार की अभिव्यक्ति के बाद चेतना और वासना प्रकट होती हैं ।जिससे चित्त में संकल्प और विकल्प आते जाते हैं ।

इस वृत्ति को ही ” मन ” कहा जाता है । अहंकार और वासना युक्त हो ये कर्मों में प्रवृत हो कर्ता और भोक्ता हो जाता है ।मन अंत: करण का मात्र रूप है । जब ये दुनियादारी में लिप्त हो जाता है तो ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से अनुभव भी संग्रहित कर लेता है । ये अनुभव इसके भीतर स्थाई रूप से संग्रहित रहते हैं , मानों कोई चिप भीतर फिट हो ।ये अनुभव फिर अगले जन्म में भी प्रेरणा देने वाले होते हैं । ये आत्मा के वास्तविक स्वरूप को भूला देता है । जो इसका अज्ञान है । इस अज्ञान का नाश इसकी समस्त वृत्तियों को शांत कर देने से ही होता है । इसी का नाम ” योग ” है ।वास्तविक स्वरूप वह चैतन्य आत्मा ही है , मन कदापि नही ।

लेखक एवं विचारक :– आचार्य भारत भूषण गौड़

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