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सत्संग से श्रद्धा उत्पन्न होती है :- प लक्ष्मी नारायण मिश्र

अरे, तीर्थयात्रा का तात्पर्य ‘महत्सेवा’ महापुरुष की सेवा! महापुरुष की सेवा करने से क्या होगा मालूम है? ‘शुश्रूषोः श्रद्दधानस्य’ मन में श्रद्धा पैदा होने लग जाएगी। इसलिए महत्सेवा पहली मानी गयी है।

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा

पहली भक्ति सत्संग है। सत्संग से प्रारंभ करो। सत्संग करोगे तो मन में श्रद्धा उत्पन्न होगी और सुनने की इच्छा होगी। इससे क्या होगा? ‘वासुदेव कथा रुचिः’।

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।

भगवान की कथा में रमण होने, लगेगा, रस आने लगेगा। तो पहले तीर्थयात्रा। यहाँ तीर्थयात्रा का तात्पर्य है सत्संग, महापुरुषों की सेवा। उससे श्रद्धा उत्पन्न होगी, और तब श्रद्धापूर्वक भगवान की कथा का श्रवण करने लग जाओगे, और तब-

श्रृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तिनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्।।

जब हम भगवान की कथा सुनने लग जाते हैं तो भगवान श्रीकृष्ण हमारे कानों के द्वारा हृदय में प्रविष्ट हो जाते हैं और वहाँ जो कूड़ा है उसे उड़ा देते हैं, साफ कर देते हैं। इसलिए तुलसीदास जी कहते हैं-

मम हृदयकंज निवास कुरु कामादि खल-दल गंजनम्।

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