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Special on the first President of the Indian independence movement, Dr. Rajendra Prasad
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भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पर विशेष

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का नाम भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। सादगी के लिए मशहूर राजेन्द्र प्रसाद का जन्म जीरादेई (बिहार) में 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। उनके पिता का नाम  महादेव सहाय तथा माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। उनके पिता संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे एवं  माता धर्मपरायण थीं। किसी भी तरह के विवादों से दूर रहे राजेन्द्र बाबू को देशरत्न कहकर भी संबोधित किया जाता है। प्रसाद स्‍वाधीन भारत के केंद्रीय मंत्री भी रहे थे, दूसरी बार 1957 में उन्होंने इस पद के लिए शपथ लिया था। जबकि 1962 में उन्होनें पद का त्याग कर दिया।  डाक्‍टर राजेंद्र प्रसाद की शादी 13 वर्ष की उम्र में राजवंशी देवी से हुई।

शांत स्वभाव और मुस्कान से बनी एक अलग पहचान
एक वकील के रूप में अपने करियर की शुरुआत करते हुए उनका पदार्पण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन हो  गया था। वे अत्यंत सौम्य और गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। सभी वर्ग के व्यक्ति उन्हें सम्मान देते थे। वे  सभी से प्रसन्नचित्त होकर निर्मल भावना से मिलते थे।
भारत के राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल 26 जनवरी 1950 से 14 मई 1962 तक का  रहा। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए अनेक बार मतभेदों के विषम प्रसंग आए, लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति पद पर  प्रतिष्ठित होकर भी अपनी सीमा निर्धारित कर ली थी। सरलता और स्वाभाविकता उनके व्यक्तित्व में  समाई हुई थी। उनके मुख पर मुस्कान सदैव बनी रहती थी, जो हर किसी को मोहित कर लेती थी।
महात्मा गांधी के प्रभावित होकर कांग्रेस में हुए शामिल
गांधी जी की विचारधारा से प्रभावित होकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हुए और स्‍वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। राजेंद्र प्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक से अधिक बार अध्यक्ष रहे। महात्‍मा गांधी के प्रभाव में आने पर 1921 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर के पद से त्‍यागपत्र दे दिया। 1934 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गये। बाद में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अध्यक्ष पद छोड़ने पर एक बार फिर 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला।
राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ लेखन की भी रखते थे शौक
जानकारी के मुताबिक राजेन्द्र बाबू के राष्ट्रपति रहते हुए आगर कोई विदेशी अतिथी भवन में आते थे तो स्वागत में उनकी आरती की जाती थी, जिससे मेहमानों को भारत की संस्कृति का पता चले। शांत स्वभाव वाले राजेन्द्र बाबू एक लेखक भी थे उन्‍होंने 1946 में अपनी आत्मकथा के अलावा और भी कई पुस्तकें लिखी जिनमें बापू के कदमों में (1954), इण्डिया डिवाइडेड (1946), सत्याग्रह ऐट चम्पारण (1922), गान्धीजी की देन, भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र आदि कई रचनायें शामिल हैं। सन 1962 में राष्‍ट्रपति पद से अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें ‘भारत रत्‍न’ की उपाधि से सम्मानित किया।

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