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The spirit of persecution and the spirit of Imam Hussain
The spirit of persecution and the spirit of Imam Hussain
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जुल्मों तशद्दुद की सरजमीं और इमाम हुसैन का जज़्बा

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मोहर्रम नए साल का पहला महीना है। मोहर्रम की पहली तारीख से लेकर दसवीं तारीख को विशेषरूप से पैगंबर मोहम्मद सल्लाहो अलैही वसल्लम के नवासे और उनके अनुयायियों के शहादत के रूप में मनाया जाता है। ये वे दिन है  जब यजीद समुदाय के लाखों सैन्य बलोें के सामने  इमाम हुसैन, उनके परिवारजन और कुछ अनुयायियों समेत महज़ 72 लोगों ने इस्लाम और खुदा की राह में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

कर्बला के जंग की वजह
  • इराक और कूफ़ा के लोगोें पर शासक यजीद शासन करता था। यजीद दुष्ट और अत्यचारी था और अपनी हुकूमत में गैर इस्लामिक काम किया करता था, इराक और कूफ़ा के लोगो ने हजरत इमाम हुसैन को कई खत लिख कर कूफ़ा आने को कहा ताकि वो उनके हाथों में बैत कर के उन्हें अपना खलीफा बनाये लेकिन यज़ीद चाहता था कि हुसैन उसके साथ हो जाएं और इस्लाम उनकी मुट्ठी में। इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयायियों के काफिल को तोड़ने के लिए यजीदियों ने बेइंतेहा जुल्मो तसद्दुद किए लेकिन न तो इमाम हुसैन ने घुटने टेकें और न ही 72 अनुयायियों में शामिल किसी औरत-मर्द और बच्चों ने।

 

  • 680 ईसवीं में हज़रत इमाम अपना घर मदीना छोड़कर हज़ के इरादे से मक्का की ओर रवाना हुए। इस दौरान उन्हें हज़ यात्रियों के भेष में छिपे यजीदी और उन्हें कत्ल करने की भनक मिली तो उन्होनें कूफा जाने का बेहतर समझा। क्योंकि इमाम हुसैन नहीं चाहते थे कि मक्का जैसी पाक जगह पर खून बहे। कूफा के रास्ते में ही यजीद की सेना उन्हें घेर कर कर्बला ले आई। कर्बला पहुँचने के बाद से ही यजीदियों का सितम शुरू हुआ और सबसे पहले उन्होने पानी पर रोक लगा दिया। प्यास की शिद्दत को सब बर्दाश्त कर रहे थे लेकिन 6 महीने के असगर उन सब अनुयायियों से बढ़कर थी जो कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन के साथ थे। उसके लिए पानी की फरियाद की गई लेकिन पानी के बदले यजिदियों ने एक तीर का ऐसा वार किया जो अली असगर के गर्दन से आर-पार हो गया और उन्हें खूं से सराबोर कर दिया।
जुल्मों तशद्दुद से राहें पुर थी
  • यातनाएं यहाँ खत्म नहीं हुई 6 महीने से लेकर 13 साल के हजरत कासिम और सजदे में सर झुकाए हज़रत इमाम हुसैन की गर्दन को धोखे से धड़ से अलग कर यजीदी अपनी जीत का जश्न मनाने लगे। हज़रत इमाम हुसैन ने तन्हा ही यजीदियों का सामना किया।ऐसे हालात में जब पानी का एक बूँद भी कई हफ्तों से उनके जुबां से दूर थी। भूख, प्यास की शिद्दत के बावजूद अपने नाना के इस्लाम को खत्म होने से बचाने के लिए न तो उन्होनें खुद अपनी परवाह की न ही अपने परिवार की। अगर नमाज़ फर्ज न होती तो इमाम हुसैन के सर तो दूर यजीदी उनके एक बाल पर भी तलवार लहराने की हिमाकत नहीं करते। हजरत इमाम हुसैन जंग के बीच जब नमाज का फर्ज अदा कर रहे थे। खुदा की राह में उन्हें सब मंजूर था शहादत भी।

 

  • इसमें कोई दोराए नहीं है कि नाना के नवासों के वजह से ही इस्लाम आज तक ज़िंदा है और रोज़े कयामत तक अगर कोई मजहब रहेगा तो वह इस्लाम ही रहेगा। प्यास की शिद्दत से हुसैन के लबों से ज्यादा तो पानी के हर कतरें को अपने अस्तित्व पर मलाल रहा होगा जो नाना के नवासे के लबों को न चूम सकीं। मोहर्रम का शुरूआती 10 दिन हर इमानवाले के लिए जहाँ गमज़दा होने का दिन है वहीं हक के लिए सबकुछ कुर्बान करने के लिए पैगंबर मोहम्मद सल्लाहो अलैही वसल्लम, उनके  नवासे और उनकी आल के लिए गर्व करने का भी दिन है। खुदा से ही सबकुछ है और खुदा के लिए ही सबकुछ है।
मोहर्रम क्या है?

बाज़ लोग ढ़ोल तासों के साथ, ताजियाँ का जुलुस निकालकर इस दिन को मनाते है। जरूरी है कि इस दिन रोजा, नमाज़ की अदायगी के बाद हक पर चलने की तौफीक के साथ, उस कुर्बानी को याद किया जाए जो हमारे प्यारे नाना के दुलारे इमाम हुसैन ने दी थी। कुर्बानी को याद कर इस्लाम की अहमियत को समझते हुए हर उस नापाक सोच और काम से दूर रहना चाहिए जिसकी इजाज़त खुदा नहीं देता।

 

गुलफशा अंसारी

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