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There was a chasm for the Indian economy, there were situations like a well
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भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इधर खाई ,उधर कुआं जैसे हालात पैदा हुए

नैशनल थॉट्स/आलोक गौड़  –  कोरोना वायरस से निपटने के लिए लागू किए गए लाक डाउन के कारण पूरी तरह से चौपट हो गई भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के मोदी सरकार के प्रयासों के बीच उसके लिए एक और बुरी ख़बर आई है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच और स्टैंडर्ड एंड पुअर्स के बाद अब मूडीज ने भी भारत की क्रेडिट रेटिंग ( साख) गिरा दी है। जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार से कर्जा मिलना मुश्किल हो जाएगा। इतना ही नहीं इससे उस पर पहले से लिए गए कर्ज को वापस करने का दबाव भी काफी बढ़ जाएगा।
क्रेडिट रेटिंग गिरने से कर्ज उठाने के लिए विदेशी बाजार और घरेलू बाजार में जारी किए जाने वाले भारत सरकार के बांड को कम भरोसेमंद माना जाएगा।

मूडीज ने भारत की जो क्रेडिट रेटिंग तय की है। वह पिछले 22 सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। इससे पहले साल 1998 में भारत की क्रेडिट रेटिंग सबसे निचले स्तर पर पहुंची थी। उस समय भी केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीएमसी सरकार सत्ता में थी। तब भारत की ओर से पोखरण में परमाणु परीक्षण किए थे। जिसके बाद अमेरिका ने उसके खिलाफ कार्रवाई करते हुए आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे।भारत सरकार के लिए गनीमत और राहत की बात इतनी ही है कि मूडीज ने उसकी क्रेडिट रेटिंग गिरा कर बीएए 2 पर पहुंचाई है। जिसे इन्वेस्टमेंट ग्रेड का सबसे निचला पायदान माना जाता है। जिसकी वजह से भारत सरकार की ओर से जारी किए जाने वाले लंबी अवधि के बांड अभी भी निवेश के लायक माने जाएंगे बस इनमें जोखिम ज्यादा बड़ा माना जाएगा।

दरअसल पिछले साल नवंबर में ही आशंका थी कि मूडीज एजेंसी भारत की क्रेडिट रेटिंग गिरा सकती है। लेकिन तब उसने इससे एक पायदान ऊपर यानी एबीबी 3 पर बरकरार रखी थी। हालांकि तब भी उसे यह आशंका थी कि इसीलिए उसने अपना नजरिया स्टेबल से बदल कर निगेटिव कर दिया था। तब मोदी सरकार के नीति निर्धारकों और दूसरे आर्थिक विश्लेषकों की तरफ से कहा गया था कि इससे ज्यादा फिक्र करने की जरूरत नहीं है क्योंकि आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ लेगी। जिससे मूडीज का मिजाज भी बदल जाएगा। मगर रेटिंग गिराने के बाद भी मूडीज ने अपना नजरिया नकारात्मक रखा।

उसे यहां हालात और भी ज्यादा खराब होने की आंशका है। मूडीज के मुताबिक भारत में आर्थिक सुधार लागू करने की रफ्तार साल 2017 से ही काफी सुस्त है। इसके अलावा जीडीपी की वृद्धि दर भी काफी कम है और केंद्र व राज्य सरकारों के खजाने की हालत खस्ता है। इतना ही नहीं सरकार का बजटीय घाटा पहले से ही 72 फीसदी तक पहुंच चुका है और इसके बढ़ कर 84 फीसदी तक पहुंच जाने की आशंका है। मूडीज एजेंसी के इस नजरिए का आधार देश में व्याप्त कोरोना वायरस संकट और उससे निपटने के लिए लागू किए गया लाक डाउन नहीं है बल्कि उससे पहले का समय है।

यह वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता व खतरनाक बात है।कोरोना वायरस से निपटने के लिए लागू किए गए लाक डाउन की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो चुकी है और उसे पटरी पर लाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज देने की घोषणा की है। लेकिन उसका भी कोई लाभ नहीं होगा। क्योंकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने और बाजार में मांग पैदा करने के लोगों को नगदी देने के बजाय इसमें सारा जोर बैंकों से कर्ज दिलाने पर दिया गया है।भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन से लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी तक कह चुके हैं कि जब तक लोगों की जेब में सीधे पैसे नहीं आएंगे तब तक स्थिति में सुधार होने की कोई गुंजाइश नहीं है।

लाक डाउन के कारण देश में बेरोजगारी की दर 45 सालों में सबसे ज्यादा हो गई है।कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर लगातार उस पर हमला बोल रहे हैं। उनका कहना है कि मोदी सरकार विदेशी एजेंसियों की ओर से उसकी क्रेडिट रेटिंग गिरा देने की आशंका की वजह से गरीब तबके और अन्यय जरूरतमंदों की मदद करने के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोलने से हिचकिचा रही है। दूसरी ओर आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार का बजटीय घाटा और भी ज्यादा बढ़ेगा तो अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां उसकी क्रेडिट रेटिंग काफी ज्यादा कम कर देंगी। जिसकी वजह से उसे विदेशी बाजार से कर्ज प्राप्त करने में दिक्कत होगी। या फिर उसे अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए ऊंची ब्याज दर व उसकी शर्तों पर कर्ज लेना होगा। यह दोधारी तलवार पर चलने के समान होगा।

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