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मेरे हृदय में आप निवास कीजिए:- पंडिंत लक्ष्मी नारायण मिश्र

मेरे हृदय में आप निवास कीजिए।’’ क्योंकि भगवान का निवास होगा तो वे सारी गन्दगी को हटा देंगे। हमारा हृदय व्यर्थ की बातें सुन-सुनकर ही खराब हुआ है। किसी व्यक्ति के बारे में मन में जो द्वेष पैदा होता है वह प्रायः सुनकर ही होता है। कोई ऐसे ही झूठी-सच्ची बात बताता रहता है और हम सुन-सुनकर अपने मन को खराब कर लेते हैं। कोई जब कहता है कि यह आदमी बहुत अच्छा है, दस लोगों से उसके विषय में बहुत अच्छी-अच्छी बातें सुनते हैं, तो उस आदमी के प्रति हमारे मन में अच्छा भाव उत्पन्न होता है। अतः हम क्या सुनते हैं, इस पर विशेष रूप से विचार करना चाहिए ध्यान देना चाहिए। भगवान की कथा सुनने से भगवान ही भीतर प्रवेश करते हैं और हृदय में जमे हुए सारे कचरे को साफ कर देते हैं। जब कचरा साफ हो जाता है, तब क्या होता है?

नष्टप्रायेष्ठभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ।।[1]

जब हमारे मन से मैल पूरी तरह से निकल जाता है तब मन में भगवान के लिए नैष्ठिकी भक्ति हो जाती है। ऐसी भक्ति होती है कि वह कभी भी, किसी भी प्रकार से विचलित नहीं होती। भगवान में रति हो जाती है। अभी हमारे मन में दूसरे विषयों की कामनाएँ हैं, इसलिए भगवान के लिए हमारा जो प्रेम है वह शुद्ध नहीं हैं। इसलिए उसमें भगवान निष्ठा नहीं आती। वह इधर-उधर भाग जाती है। लेकिन जब मन रजोगुण व तमोगुण से मुक्त हो जाता है जो बस, फिर क्या कहना है?
देखो, ऋषियों ने पूछा था कि मनष्य का सबसे बड़ा श्रेय किसमें है? तो बोल – भगवद्भक्ति उत्पन्न होने में है। है या नहीं? और हमारे धर्म का प्रयोजन भी भगवद्भक्ति ही है, अतः धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की अच्छी तरह से विवेचना करें और समझें कि कौन-सी चीज़ किसलिए है? यहाँ पर एक व्यावहारिक उपाय बताया गया कि हम प्रारंभ कहाँ से करें- ‘सत्संग से’। देखो, हम सत्संग में बैठे हैं, इसीलिए इतनी बातें समझ में आयीं, है न? सत्संग नहीं करते तो ये बातें समझ में नहीं आतीं। सत्संग से ही ये बातें समझ में आती हैं।
कहतें हैं कि ये जो एक अद्वयं भगवान हैं, परमात्मा है, जिनको अद्वय ब्रह्म कहते हैं, वे ही अपनी माया-शक्ति से ईश्वर कहलाते हैं। ईश्वर की माया त्रिगुणात्मिका (सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोणुण) है। तो इन गुणों की दृष्टि से भगवान का कोई रूप उग्र दिखाई देता है तो कोई शान्त, कोई रजोगुण प्रधान रूप होता है, तो कोई सत्त्वगुण प्रधान। भिन्न-भिन्न अवतारों में भगवान के भिन्न-भिन्न रूप दिखाई देते है। समझदान मुमुक्षु लोग भगवान के सात्त्विक रूप का ध्यान करते हैं। जो भगवान सबसे प्रेम करने वाले हैं, उनका ध्यान करते हैं।

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