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भगवत गीता में लिखा है, ‘स्वधमें निधनं श्रेय परधर्मों भयावह’: यानि पराये धर्म में जीने से, निजी धर्म में रहकर ही मरना ही बेहतर है। भय दुख और अशांति में जीने से अच्छा है कि निर्भयता, शांति व खुशी-खुशी आत्मधर्म में रहकर अपना शरीर छोड़ें। अक्सर, शरीर के साथ आत्मा को जोड़कर ही किसी व्यक्ति परिचय दिया जाता है।
अधिकतर व्यक्ति के दैहिक नाम, आयु, माता-पिता व्यवसाय, देश, जाति, धर्म, भाषा आदि का परिचय देते हैं। लेकिन सभी का अपना अपना धर्म है। किसी भी धर्म को अपनाने की अपनी प्रक्रिया है।
*हमारे भारत में ही ऐसे धर्म हैं जिन्हे आप बिना विधिवत् अपनाए उनकी संस्थाओं तक के सदस्य तक नहीं बन सकते। यह नियम बनाए इसलिए गए हैं कि अपने ही धर्म में रहकर उसका सम्मान कीजिए।
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