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National Thoughts
Analyse Editorial

मनोज तिवारी के इस दावे का आधार क्या है?

हर बात पे उठती हैं उंगली हमारी तरफ
क्या हमारे सिवा शहर में मासूम है सारे

दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों के लिए हुए मतदान के बाद सभी एक्जिट पोल में आम आदमी पार्टी भारी बहुमत के सत्ता में वापसी करती नज़र  आ रही हैं। वहीं दूसरी तरफ प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने यह दावा करके कि भाजपा 48 सीटें हासिल कर सरकार बनाएगी ने दिल्लीवासियों के दिल में बेचैनी पैदा करने के साथ ही उनके मन में इलैक्ट्रोनिक वोट मशीन (ईवीएम) और चुनाव आयोग के प्रति संदेह पैदा कर दिया है। यह सही है कि एक राजनीतिक दल का प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते मनोज तिवारी को मतगणना से पहले अपनी पार्टी की सरकार बनने का दावा करने का पूरा हक है। लेकिन वह भाजपा को 48 सीटें मिलने का दावा किस आधार पर कर सकते हैं। उनके द्वारा भाजपा को 48 सीटें मिलने के दावा ही लोगों में बेचैनी पैदा कर रहा है। मतदाताओं को लग रहा है कि कहीं उनके इस दावे का आधार यह तो नहीं है कि भाजपा ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करने में सफल रही है।

हालांकि चुनाव आयोग ने एक जांच रिपोर्ट के आधार पर ईवीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ होने की सभी चर्चाओं को बेबुनियाद बताते हुए सिरे से खारिज़ कर दिया है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी रणबीर सिंह के मुताबिक दिल्ली विधानसभा चुनावों में 62.59 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है। यह 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान दिल्ली में हुए मतदान की तुलना में लगभग दो फीसद ज्यादा है। हालांकि पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में मतदान का प्रतिशत कुछ कम रहा है। चुनाव आयोग के मुताबिक 2013 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली के 65.63 फीसद मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। जबकि 2015 के चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 67.12 फीसद हो गया था। चुनाव आयोग के मुताबिक इस बार दिल्ली में महिलाओं और पुरूषों ने बराबरी से मतदान कर हमारे लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने में अपना योगदान दिया है। दिल्ली की 62.55 फीसद महिलाओं ने मतदान में हिस्सा लिया। जबकि पुरूषों के मामले में यह आंकड़ा 62.62 फीसद रहा।

मतों की गणना का काम मंगलवार को सुबह आठ बजे से शुरू होगा और दोपहर तक सभी नतीज़े घोषित कर दिए जाने की संभावना है। मतदान समाप्त हो जाने के बाद सभी खबरिया चैनलों की ओर से अपनी सहयोगी संस्था के साथ मिलकर कराए गए एक्जिट पोल के मुताबिक दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 50 से 65 सीटें और भारतीय जनता पार्टी को 10 से 22 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था। 70 सदस्यी विधानसभा में बहुमत का जादूई आंकड़ा 36 है। यदि एक्जिट पोल के नतीजे सटीक निकले तो आम आदमी पार्टी को दिल्ली में दोबारा से सरकार बनाने में किसी प्रकार की दिक्कत पेश नहीं आएगी। इन सभी एक्जिट पोल के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करके भारतीय जनता पार्टी के बाद दूसरे नंबर पर रहने वाली कांग्रेस को शून्य से लेकर तीन सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

इन सभी एक्जिट पोल के मुताबिक आठ महीने पहले हुए लोकसभा चुनावों में दिल्ली की सभी सातों सीटों पर अपनी जीत का परचम फहराने वाली भारतीय जनता पार्टी का दिल्ली जितना वोट शेयर था, वो उस चुनाव में तीसरे नंबर पर रहने वाली आम आदमी पार्टी अपने नाम करने में कामयाब रही हैं। क्या वास्तव में इतना बड़ा उलटफेर हो पाना संभव है? और लोकसभा व विधानसभा के चुनावों में मतदान के स्वरूप और एक्जिट पोल में दर्शाए गए आंकड़ों का आधार क्या है?  सभी मुद्दों पर नेशनल थॉट्स ने राजनीतिक विश्लेषकों व चुनावी प्रेषकों के साथ विस्तृत बातचीत की।  दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एस. के. शर्मा के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी अगर 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों को आधार मानकर दिल्ली में अपना 21 साल पुराना राजनीतिक बनवास समाप्त होता देखकर 48 सीटें मिलने का दावा कर रही है तो यह उसके लिए “मुंगेरीलाल” के हसीन सपने देखना जैसा ही होगा। इस बारे में उनका यह भी कहना है कि लोकसभा चुनावों के बाद से राज्यों की विधानसभा के लिए हुए मतदान का स्वरूप भी इसी तथ्य की ओर इशारा करता है।

एस.के. शर्मा के मुताबिक विधानसभा चुनावों में स्थानीय लीडरशिप यानि चेहरा बहुत अहमियत रखता है। राज्य के मतदाता विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों के साथ चेहरे को खासा महत्व देते हैं। वह जिस चेहरे पर विश्वास करते है, उसे ही राज्य के सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड राज्य की 14 में से 12 सीटें जीतकर अपना लोहा मनवाया था लेकिन इसके कुछ महीने बाद ही झारखंड विधानसभा के चुनावों में राज्य के मतदाताओं ने इस पार्टी को पूरी तरह से ठुकरा दिया। इसी तरह हरियाणा विधानसभा के चुनाव में भी मतदाताओं का ऐसा ही रूख नज़र आया। इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सभी 10 सीटों पर जीत हासिल की थी लेकिन विधानसभा के बाद भाजपा को राज्य में सरकार बनाने के लिए जेजेपी जैसी नई पार्टी का सहारा लेने पर मजबूर होना पड़ा। दरअसल इस राज्य की जनता ने विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के मुकाबले पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को प्रभावी व अधिक भरोसेमंद माना था। जबकि लोकसभा चुनाव के समय में मतदाताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही भरोसा जताया था।

दिल्ली में भाजपा के सामने यही चुनौती थी कि वह आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मुकाबले ऐसा प्रभावी चेहरा सामने लाती है जिस पर मतदाता भरोसा करते हैं। मगर भाजपा ने ऐसा करने के बजाय विधानसभा का चुनाव भी प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर ही लड़ा। वैसे भी भाजपा यह अच्छी तरह से जानती थी कि मनोज तिवारी या विजय गोयल का केजरीवाल जैसा करिश्मा नहीं हैं। चुनावी अभियानों से दो बातें स्पष्ट होती हैं कि एक तो आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता में वापिस लौट रही है। दूसरी प्रधानमंत्री मोदी अभी भी देशवासियों की पहली पसंद बने हुए हैं। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ चले आंदोलन को मुद्दा बनाकर हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने का जो मंसूबा भारतीय जनता पार्टी ने बांधा था, उसे मतदाताओं ने पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अरविंद केजरीवाल भाजपा के आक्रामक प्रचार के जाल में नहीं फंसे बल्कि उसे ही अपनी पिच पर खेलने के लिए मजबूर करने की रणनीति में सफल रहे हैं।

आलोक गौड़

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