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भगवान के लिए प्रेम कैसा होना चाहिए – प लक्ष्मी नारायण मिश्र

तो यहाँ भी हम पहले सिद्धान्त रूप में बात को समझ लें। सूतजी सीधा-सीधा उत्तर देते हैं कि-

स वै पुंसां परो धर्मों यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति।।[1]

आपने पूछा कि सबसे बढ़कर परम कल्याण की बात कौन सी है? परम श्रेय क्या है? तो जिसके द्वारा भगवान के चरणों में दृढ़ प्रेम हो जाए वही प्रेम श्रेय की बात है। वही सबसे श्रेष्ठ धर्म है। उसी व्यक्ति का सबसे बड़ा, परम कल्याण है।
भगवान के लिए प्रेम कैसा होना चाहिए? अहैतुकी! बिना किसी हेतु-कारण के। भगवान से जो प्रेम है उसमें यदि कोई हेतु है, जैसे- …… इसलिए मैं प्रेम करता हूँ, तो वह प्रेम नहीं है। भगवान से प्रेम तो करना है लेकिन वह प्रेम कैसा होना चाहिए? ‘अहैतुकी’।

इसी प्रकार भक्ति कैसी होनी चाहिए? तो कहा ‘अप्रतिहता’। जीवन में चाहे जितने लौकिक आघात सहने पड़े या संकटों का सामना करना पड़े, तो भी उनके कारण हमारी भक्ति हिलनी नहीं चाहिए। जबकि प्रायः थोड़ा कोई कष्ट आया कि हमारी भक्ति भागने लगती है। हम कहने लगते हैं कि भगवान हैं ही नहीं। हमारी दृष्टि से भगवान का अस्तित्व किस बात पर निर्भर करता है, मालूम है? हमारी इच्छा पूर्ति पर! हमारी इच्छा पूरी हो गयी तो भगवान हैं। इच्छा पूरी नहीं हुई तो भगवान नहीं हैं।

भगवान कितने बलवान् हैं, यह भी कैसे सिद्ध होता है- हमारी इच्छा पूर्ति के आधार पर। जैसे – किसी ने बजरंगबली को सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाया कि मैं पास हो जाऊँ। पास हो गया, तो बोले बजरंगबली बड़े शक्तिशाली हैं। दूसरी बार भी उसने वही किया। लेकिन तब फेल हो गया। तो कहने लगा- लगता है बजरंगबली की ताकत घट गयी है।

फिर वह जाकर बजरंगबली से कहता है- क्या भगवान! आपने पास नहीं किया? भगवान ने कहा – अरे, तूने पढ़ाई तो की ही नहीं थी? तो वह लड़का कहता है – पढ़ाई करके ही पास होना था तो आपके पास क्यों आता? पढ़ाई करके ही पास हो जाता। आपके पास इसलिए आया था कि आप कुछ करें।

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