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Who will elect the people in the election without issue
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मुद्दा विहिन चुनावों में जनता किसे चुनेगी

जनता खामोश तो नेता व कार्यकर्ता बेचैन

एक के बाद एक राज्य विधानसभा चुनावो में हार का सामना करने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी कोई सबक सीखने को अभी भी तैयार नहीं है।  कम से कम दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी  के प्रचार अभियान और स्थानीय स्तर से लेकर तमाम बड़े नेताओं के बयानों  से तो ऐसा ही लगता है।  दिल्ली में बीजेपी 21 सालों से सत्ता से बाहर है। फिर भी पिछली बार की तरह ही वह इस चुनाव के लिए ना तो कोई खास रणनीति के साथ मैदान में उतरती दिखाई दे रही है और ना ही उसके नेता जनता का विश्वास हासिल करने के लिए कुछ ठोस व प्रभावी कदम उठाते नजर आ रहे है।  इसे देखते हुए यदि यह कहा जाए कि भाजपा मुद्दा विहिन इन चुनावो में नमो-नमो जपते हुए ही चुनाव जीतने का हसीन सपना देख रही है, तो यह गलत नहीं होगा।

भविष्य की योजनाओ के नाम पर गठरी खाली

एक ओर जहाँ  सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल से लेकर उनके खास सिपहसालार मनीष सिसोदिया व तमाम  नेता पूर्ण आत्म विश्वास के साथ  जनता के सामने अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करने के साथ ही भविष्य की योजनाओ के बारे में ना केवल बता रहे है, बल्कि गारंटी कार्ड देकर यह भरोसा भी दिला रहे है कि इन सभी को पूरा किया जायेगा। इतना हीं नहीं आम आदमी पार्टी के इस दावें को भी किसी सूरत से नरजअंदाज नहीं किया जा सकता कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यो के कारण दिल्लीवासी विधानसभा चुनाव में सकारात्मक रूप से अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। उनका यह भी कहना है  कि दिल्ली में ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई राजनितिक पार्टी अपनी सरकार के काम की उपलब्धियों के आधार पर जनता से वोट मांग रही है। हैरानी की बात तो यह है कि विपक्ष सरकार पर नाकामी का आरोप तो लगा रहा है लेकिन भविष्य की योजनाओ के नाम पर उसकी गठरी पूरी तरह से खाली हीं दिखाई देती है।

स्थानीय मुद्दों व जनभावना का महत्व होता है सर्वाधिक

जहाँ तक  भारतीय जनता पार्टी का सवाल है तो वह अरविन्द्र केजरीवाल की सरकार के खिलाफ  भ्रष्टाचार के पुख्ता आरोप लगाने में सफल नहीं  हो पा रही है और ना ही ऐसे चुनावी मुद्दों को हवा दे पा रही है, जिससे जनता में यह उम्मीद जगे कि भाजपा भविष्य में इसकी परेशानियों को हल कर पायेगी।  प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं सांसद मनोज तिवारी दिल्ली विधानसभा चुनावों के सिलसिले में प्रभारी बनाए गए प्रकाश जावेड़कर और प्रदेश के लगभग तमाम नेता यह उम्मीद बांधे हुए है की प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे ही वह चुनावी वेतरनी को पार कर लेंगे। ऐसा लगता है की भाजपा नेता शायद यह भूल गए है की विधानसभा चुनावों के  मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों से अलग होते है और उनके चुनाव परिणाम स्थानीय मुद्दों व जनभावना का महत्व सर्वाधिक होता है, क्यूंकि यदि प्रधानमंत्री मोदी का नाम ही भाजपा की नैया पार लगाने के लिए काफी होता तो हरियाणा से लेकर झारखण्ड तक के चुनाव परिणाम भिन्न होते।

फ्लाई ओवरों के बिछे जाल व अन्य विकास कार्य

इस त्रिकोणीय चुनाव में दिल्ली की सत्ता पर लगातार 15 साल काबिज रह कर एक कीर्तिमान बनाने वाली कांग्रेस पार्टी इस बार पिछले चुनाव की अपेक्षा बेहतर परिणाम हासिल कर पाने की आस लगाए बैठी है। कांग्रेस को आम आदमी पार्टी की वजह से ही पिछली बार के चुनाव में दुर्गति झेलनी पड़ी थी।  यहाँ तक की 70 सदस्यी विधानसभा में उसका खाता तक नहीं खुल पाया था और अधिकांश उम्मीदवारों की जमानते तक जप्त हो गई थी।  कांग्रेस में  पूर्व मुख्य मंत्री स्वर्गीय शिला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली ने विकास बहुत किया मगर आम आदमी पार्टी उसके वोट बैंक को अपनी ओर खींचने में सफल रही। कांग्रेस की  पराजय का प्रमुख कारण कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के दौरान दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हुए घोटाले से लेकर भ्रष्टाचार के अनेक मामले उजागर हुए थे।  जिसकी वजह से दिल्ली की जनता में कांग्रेस के प्रति नाराज़गी पैदा हो गई थी, जिसका खामियाजा पार्टी व खुद शीला दीक्षित तक को भुगताना पड़ा।  यह बात और है कि आज भी दिल्ली की जनता मेट्रो रेल से लेकर फ्लाई ओवरों के बिछाए गए जाल व अन्य विकास कार्य को लेकर शीला सरकार को याद करती है। यही वजह है की इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने शीला सरकार की उपलब्धियों और उनके नाम से कई योजनाए शुरू करने को अपना चुनावी मुद्दा बनाया है।

यह तो 11 फरवरी को मतगणना पूरी होने के बाद ही पता चल पायेगा की जनता ने आम आदमी पार्टी, भाजपा या कांग्रेस किस पर अपना भरोसा जताया है।  लेकिन वर्तमान सूरतेहाल तो यही नजर आती है कि यह चुनाव मुद्दें विहिन है।

 

आलोक गौड़
(वरिष्ठ पत्रकार)

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